मानव मन का अन्तर्द्वन्द्व
अन्तर्द्वन्द्व से जूझ रहा मन, किस से अपनी व्यथा कहूँ?
झंझावातों की कश्ती चलती, वाणी मेरी मूक हुई।।
कैसा परिवेश बना समाज का, रिश्ते भी दम तोड़ रहे।
किस पर विश्वास करे मन, अपने ही ख़ंजर भोंक रहे।।
कहीं बेटियाँ जलाई जा रहीं हैं, कहीं बेटे हो रहे शिकार।
रिश्तों का व्यापार बना है, कुंठित है संसार।।
अन्तर्द्वन्द्व से घिरा मानव, सोच रहा है मन में।
किस से लड़े, किस से करे प्रेम, चलता विचारों का द्वन्द।।
सात फेरे ले कर अग्नि के, करते पीठ पर वार।
कभी फँसाते झूठे केस में, या फिर करते अत्याचार।।
विद्रूप होता जा रहा समाज, नक़ाब ओढ़े घूमता मानव।
अनाथाश्रम या महिलाश्रम में,
देखो भरे हैं कितने दानव।।
मानव मन सोच रहा, मिले कोई निदान।
कैसे बने शुद्ध परिवेश, सोचे सकल जहान।।
जूझ रहा है हर मानव, मन के अन्तर्द्वन्द्व से।
फिर भी इच्छाएँ उमड़ती, फँसता मन जग बंध में।।
अंजलि किशोर
उखड़ा,पश्चिम बंगाल