मैं नेहा वार्ष्णेय, दुर्ग छत्तीसगढ़ से सुन्दरकांड को चौबीस पंक्तियों में लिखी हूं…

 

मैं नेहा वार्ष्णेय, दुर्ग छत्तीसगढ़ से सुन्दरकांड को चौबीस पंक्तियों में लिखी हूं…

 

1.जामवंत ने जगाई शक्ति, हनुमान ने ली उड़ान।

 

2.रामनाम का स्मरण कर, पहुँचे लंका की जान।

 

3.समुद्र लांघ वीरता से, सिंहिका का किया संहार।

 

4.लंका नगरी में गुपचुप, दिखी बुद्धि अपार।

 

5.तुलसी पौधा देख विभीषण, रामपद की पहचान।

 

6.विभीषण ने बताया, अशोक वाटिका में सीता का स्थान।

 

7.सीता को रावण देता धमकी, त्रिजटा ने बढ़ाया हौसला।

 

8.हनुमान ने दी मुद्रिका, सीता को बँधा विश्वास का ताला।

 

9.आदेश पाकर वाटिका में, मचाया भारी विध्वंस।

 

10.अंगद सा बढ़ाया पाँव, काँपी लंका, काँपा रावण का वंश।

 

11.रावण ने भेजा अक्षयकुमार, हनुमान ने किया संहार।

 

12.मेघनाद ने बाँधा ब्रह्मपाश, हनुमान ने तोड़ा जाल अपार।

 

13.पहुँचे रावण दरबार, बोले रामदूत सत्य वचन।

 

14.रावण ने पूँछ में बाँधी आग, लंका जली, हनुमान बने अग्निकण।

 

15.सीता को दी चूड़ामणि, दिया शीघ्र उद्धार का संदेश।

 

16.गगन पंथ से लौटे, रामभक्ति में दृढ़ निश्चय विशेष।

 

17.राम ने हृदय लगाया, हनुमान को भाई सा अपनाया।

 

18.राम-लखन-सुग्रीव हर्षाए, जयजयकार गूँज उठाया।

 

19.विभीषण ने दिया साथ, धर्म की राह दिखाई।

 

20.नल-नील ने सेतु बनाया, राम ने सेना बढ़ाई।

 

21.युद्ध हुआ विकराल, रावण का हुआ विनाश।

 

22.सीता संग राम लौटे, अयोध्या में छाया उल्लास।

 

23.हनुमान सदा प्यारे, संकट हरने वाले न्यारे।

 

24.सुंदरकांड का पाठ करें, जीवन में सुख-शांति धारे।

 

स्वरचित…..

नेहा वार्ष्णेय

दुर्ग (छत्तीसगढ़)