
एक शाम तुम्हारे साथ जो आई यादों में,
खुशबू सी बसी है अब तक उन बातों में।
चुपचाप निगाहें बोल रही थीं कुछ हमसे,
जैसे दिल धड़कता हो ख़ामोश रातों में।
हवा भी ठहर गई थी, वक़्त रुक सा गया,
तेरा होना लगा में ठहरी हवाओं में।
ना कोई सवाल था, ना कोई जवाब था,
बस प्यार छलक रहा था हमारी निगाहों में।
वो शाम न थी बस एक पल का सफ़र,
ज़िंदगी गुजर गई है अब उन्हीं फिजाओं में
___________प्रज्ञा शुक्ला वृंदा
लखनऊ उत्तर प्रदेश