ग़ज़ल
चाँद से चेहरे के दीदार में आ जाती हैँ
ज़िंदगी खुशियों के. संसार में आ जाती है
मेहरो इखलास की चर्चा तो कहीं होती नहीं
हर खबर ज़ुल्म की अख़बार में आ जाती है
जब भी होती है अचानक से मयससर दौलत
इक अदा चलने की रफ्तार में आ जाती है
बद गुमानी न कभी दिल में रफीक़ो रक्खो
दरमियां खास कमी प्यार में आ जाती है
रह नहीं पाता हूँ मै शेरो सुखन में महफ़ूज़
आशिक़ी ग़ज़लों के अशआर में आ जाती है
ऐसा होता है गमे हिज्र में तो अक्सर ही
इक चमक चेहरे पे दीदार में आ जाती है
फैज़ मिलता है मुझे प्यारे नबी से तारिक़
जब भी कश्ती मेरी मंझधार में आ जाती है
असलम तारिक