आचार्य डा. रामनाथ वेदालंकार जी की पुस्तक महर्षि दयानन्द के शिक्षा, राजनीति और कला-कौशल सम्बन्घी विचार पुस्तक के नये संस्करण की प्रतीक्षा”

ओ३म्
“आचार्य डा. रामनाथ वेदालंकार जी की पुस्तक महर्षि दयानन्द के शिक्षा, राजनीति और कला-कौशल सम्बन्घी विचार पुस्तक के नये संस्करण की प्रतीक्षा”
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आचार्य डा. रामनाथ वेदालंकार जी आर्यजगत् के सुविख्यात वैदिक विद्वान रहे हैं। उन्होंने वैदिक विषयों पर अनेक महत्वपूर्ण ग्रन्थ दिये हैं। उनका संस्कृत एवं हिन्दी में सामवेद का भाष्य उपलब्ध सभी सामवेद के भाष्यों में अद्वितीय एवं अत्युत्तम है। उनके अन्य प्रमुख प्रसिद्ध ग्रन्थ वैदिक नारी, वेद मंजरी, आर्ष ज्योति, वैदिक मधुवृष्टि, वेदभाष्यकारों की वेदार्थ प्रक्रियायें, वेदों की वर्णन-शैलियां, वैदिक शब्दार्थ-विचार, यज्ञ-मीमांसा, महर्षि दयानन्द के शिक्षा, राजनीति और कला-कौशल सम्बन्धी विचार, ऋग्वेद-ज्योति, यजुर्वेद-ज्योति, अथर्ववेद ज्योति, उपनिषद्-दीपिका, वैदिक वीर-गर्जना, वैदिक सूक्तियां एवं कुछ अन्य ग्रन्थ हैं। आचार्य जी के अधिकांश ग्रन्थ तो आर्यसमाज के साहित्य के अनेक प्रकाशकों द्वारा प्रकाशित हुए हैं जिनका आर्य जनता में अच्छा प्रचार हुआ है। उनकी कुछ पुस्तकें आर्यसमाज से इतर प्रकाशकों से भी प्रकाशित हुई हैं। एक पुस्तक ‘‘महर्षि दयानन्द के शिक्षा, राजनीति और कला-कौशल सम्बन्धी विचार” का प्रकाशन ‘प्रकाशन ब्यूरो, पंजाब विश्वविद्यालय, चंडीगढ़’ से सन् 1982 में लगभग 43 वर्ष पूर्व हुआ था। यह पुस्तक हमें आचार्य रामनाथ वेदालंकार जी ने स्वयं दी थी। इसी कारण हम इस पुस्तक से परिचित हो सके थे और हमें लगभग 30 वर्ष पूर्व इस पुस्तक को पढ़ने का अवसर प्राप्त हुआ था। हमने पाया था कि यद्यपि इस पुस्तक की सामग्री ऋषि दयानन्द के ग्रन्थों से लेकर उसका सम्पादन वा प्रकाशन हुआ है परन्तु इसे एक प्रकार से ऋषि दयानन्द का एक अन्य नवीन ग्रन्थ कह सकते हैं जहां उनके सभी ग्रन्थों से सामग्री का संकलन कर उसे विषय एवं उपशीर्षकों को देकर उसका प्रकाशन किया गया है। स्वाध्यायशील पाठक जब इस ग्रन्थ को पढ़ते हैं तो उन्हें इस पुस्तक में इन विषयों के दिये गये ऋषि दयानन्द के विचारों को समग्रता से जानने का अवसर मिलता है। हर व्यक्ति के लिये यह सम्भव नहीं होता कि वह ऋषि के सब ग्रन्थों को पढ़कर उनमें से किसी एक विषय पर उनके द्वारा प्रस्तुत समग्र विचारों से परिचित वा अभिज्ञ हो सके। आचार्य डा. रामनाथ वेदालंकार जी ने इस विषय पर विस्तृत अध्ययन कर इसे एक अनुसंधान कृति के रूप में प्रस्तुत किया है। सभी ऋषि भक्तों तक उनका यह प्रयत्न पहुंचना चाहिये था परन्तु हम अनुभव करते हैं कि इसका प्रकाशन आर्य प्रकाशकों से इतर अन्य प्रकाशन संस्था द्वारा होने से यह आर्यसमाज के सभी स्वाध्यायशील बन्धुओं तक पहुंच नहीं सकी है। हम अनुभव करते हैं कि इसका एक भव्य संस्करण किसी प्रमुख आर्य प्रकाशक द्वारा प्रकाशित हो जिससे यह सभी आर्य स्वाध्यायशील बन्धुओं तक पहुंच जाये।

इस पुस्तक पर कापीराइट का चिन्ह देकर इसे सर्वाधिकार सुरक्षित घोषित किया गया है। पुस्तक के मुख पृष्ठ पर यह बताया गया है कि यह पुस्तक महर्षि दयानन्द वैदिक अनुसंधान पीठ, पंजाब विश्वविद्यालय के तत्वावधान में लिखी गई है। इससे यह अनुमान होता है कि शायद इसका प्रकाशन से 60 वर्ष बाद तक बिना अनुमति के प्रकाशन नहीं किया जा सकता। हम अनुभव करते हैं कि यदि डा. रामनाथ वेदालंकार जी जीवित होते तो उनकी अनुमति वा पंजाब विश्वविद्यालय, चंडीगढ़ की सहमति प्राप्त कर इसका प्रकाशन किया जा सकता था।

आचार्य डा. रामनाथ वेदालंकार जी का एक अन्य ग्रन्थ है वेदभाष्यकारों की वेदार्थ-प्रक्रियाएं। इस ग्रन्थ का प्रथम संस्करण सन् 1980 में विश्वेश्वरानन्द विश्वबन्धु संस्कृत भारती शोध संस्थान, पंजाब विश्वविद्यालय, होशियारपुर से हुआ था। यह संस्करण भी कापीराइट वा सर्वाधिकार सुरक्षित है, ऐसा पुस्तक के मुख पृष्ठ के पीछे मुद्रित है। इस ग्रन्थ का तृतीय संस्करण सन् 2008 में श्री घूडमल प्रहलादकुमार आर्य धर्मार्थ न्यास, हिण्डौन सिटी से प्रकाशित हुआ है। हमने कीर्तिशेष श्री प्रभाकरदेव आर्य जी से सुना था कि आचार्य डा. रामनाथ वेदालंकार जी अपने सभी ग्रन्थों के प्रकाशन का अधिकार उन्हें प्रदान कर गये थे। यदि स्व. श्री प्रभाकरदेव जी जीवित होते तो हम आशा करते हैं कि ‘महर्षि दयानन्द के शिक्षा, राजनीति और कला-कौशल सम्बन्धी विचार’ पुस्तक का प्रकाशन उनके द्वारा किया जाता। अब क्योंकि वह नहीं है तो हम समझते हैं कि आचार्य जी के परिवारजनों व श्री प्रभाकरदेव जी के परिवारजनों की सहमति वा अनुमति से इस ग्रन्थ का प्रकाशन किया जा सकता है।

महर्षि दयानन्द के शिक्षा, राजनीति और कला-कौशल सम्बन्धी विचार पुस्तक में इस पुस्तक का मूल्य रूपये 25/- अंकित है। बाद में इसमें वृद्धि कर इसे रू. 45/- कर दिया गया था। हम समझते हैं कि इसकी बची हुई सभी प्रतियों को कोई आर्य प्रकाशक पंजाब विश्वविश्वविद्यालय से मूल्य देकर प्राप्त कर लें और उन्हें आर्यसमाज के स्वाध्यायशील पाठकों को उचित मूल्य पर उपलब्ध करा दें। हम यह भी अनुभव करते हैं कि इस पुस्तक का एक नया भव्य संस्करण प्रकाशित होना चाहिये जिसे आर्यसमाज के सभी स्वाध्यायशील पाठकों द्वारा, जिन्होंने इस ग्रन्थ को पढ़ा नहीं है, खरीद कर पढ़े और इसके प्रचार प्रसार में सहायक बनें। भावी पाठकों वा पीढ़ियों के लिए भी यह पुस्तक सुलभ होनी चाहिये। ऐसा करने से हम समझते हैं कि हम आचार्य जी के प्रति एक अच्छा कार्य करेंगे जिससे यह ग्रन्थ कालान्तर में लुप्त न हो जाये।

हमें यह उचित लगा कि हम इस पुस्तक का उल्लेख कर आर्यसमाज के स्वाध्यायशील पाठकों तक इस पुस्तक का परिचय प्रेषित करें और इसके नये संस्करण के प्रकाशन के लिए आर्य प्रकाशकों को निवेदन एवं प्रेरित करें। ओ३म् शम्।

-मनमोहन कुमार आर्य