*पाप व अविमुक्तेश्वरानंद*आचार्य सुरेश जोशी

🌸🌸 ओ३म् 🌸🌸
🌻 *पाप व अविमुक्तेश्वरानंद*🌻
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आज से लगभग २३०० वर्ष पूर्व सत्य-सनातन वैदिक संस्कृति छिन्न भिन्न हो ग ई थी। वैदिक धर्म का विकृत रुप शैवमत,बौद्ध मत व जैनमत के रुप में विकृत हो गया था।ऐसे समय में धर्म के स्वरुप को शुद्ध रूप में लाने के लिए ईश्वरीय न्याय व्यवस्था से एक महापुरुष का प्रादुर्भाव गौड़पादाचार्य के शिष्य *आचार्य शंकर* के रुप में हुई।शंकराचार्य ने अपने गुरु से दीक्षित होकर भारत का भ्रमण शुरु किया।वे अपने समय के सनातन संस्कृति के अद्वितीय पंडित थे।उन्होंने देखा कि वेदमत को छोड़कर लोग मत-मतांतरों में बंट व कट रहे हैं इसका कोई उपाय होना चाहिए।
बहुत सोच विचार कर उन्होंने शास्त्रार्थ को सत्य व वेदोक्त मार्ग समझा।इस विचार से वो धार्मिक नगरी उज्जैन पहुंचे।वहां *जैन मत के अनुनाई राजा सुधन्वा* को शास्त्रार्थ हेतु निवेदन व निम़त्रण दिया।राजा स्वयं भी विद्वान थे और भी जैन विद्वानों को लेकर शंकराचार्य जी शास्त्रार्थ में उतरे परिणाम स्वरुप वो शास्त्रार्थ में हार गये और उन्होंने वेदमत स्वीकारा तथा धर्म प्रचार हेतु आचार्य शंकर को सुरक्षा व सहयोग दिया।इसी समय शंकाराचार्य जी ने 🍐 शंकर दिग्विजय यात्रा🍐 निकाली कोई भी तात्कालीन मत-मतांतरों के वैदिक व अवैदिक विद्वान उनके 🪷तेज,ब्रह्मचर्य,त्याग,विद्वत्ता,देश भक्ति,समर्पण🪷 के आगे नहीं टिक सका। इसी समय उन्हें सर्वसम्मति से ✍️ *जगदगुरु आदि शंकराचार्य*✍️ की उपाधि से अलंकृत किया।वेदमत को सदैव सुरक्षित करने व किसी विदेशी मत के देश में प्रवेश को रोकने के लिए उन्होंने आर्यावर्त्त देश के चारों कोनों में चार मठों की स्थापना की।इन मठों में अपने उद्भट्ट शिष्यों को *धर्म प्रहरी* के नाम से नियुक्त किया।किसी षड़यंत्र के तहत आदि गुरु शंकाराचार्य को जैन कपटी शिष्य ने विषपान कराकर उनका शरीरांत कर दिया।कालांतर में यही मठों के धर्म प्रहरी भी शंकराचार्य के नाम से जाने ,जाने लगे।
🌽 *ज्योतिर्मठ के धर्म प्रहरी* 🌽
इन्हीं चार मठों में से एक मठ है ज्योतिर्मठ जो उत्तराखंड में स्थित है।उसी के धर्म प्रहरी हैं 🧘 श्रीमान् अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती जी 🧘 जो वहां के *वर्तमान शंकराचार्य* कहे जाते हैं।
🌼 *अविमुक्तेश्वरानंद उवाच* 🌼
शंकराचार्य कहे जाने वाले अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती जी कुंभ स्नान के बारे में अपनी टिप्पणी देते हुए कहते हैं कि *सनातनी हिंदू ही कुंभ में आवें उनके ही पाप स्नान करने से मुक्त होंगे! आर्य समाजी हिंदू,बौद्ध हिंदू,जैनी हिंदू न आयें!* ईसाई मुसलमान भी न आयें क्योंकि ये लोग कहते हैं कि गंगा स्नान करने से पापों से मुक्ति नहीं होती?
🥣 *आओ इसका पता लगायें*🥣
ईसाई व मुसलमानों की तै हम चर्चा ही नहीं करते क्योंकि कुंभ स्नान व कुंभ मेले से उनका दूर तक कोई संबध नहीं है।अब बात करते हैं हिंदुओं यानि (पतित आर्यों) की!
🦚 *हिंदुओं में विभाजन*🦚
अभी तक तो सब यही जानते थे कि हिंदु मतलब जैन,बौद्ध,सिक्ख,आर्य समाजी।अविमुक्तेश्वरानंद जी ने तो हिंदुओं के भी दो विभाग बना दिए।
*[१]* एक सनातनी हिंदू।
*[२]* आर्य समाजी हिंदू,जैनी हिंदू,बौद्ध हिंदू। मगर यह नहीं बताया कि *सिक्ख सनातनी हिंदू हैं या तीसरे सिक्ख हिंदू*। इस विषय पर हम अविमुक्तेश्वरानंद जी से प्रश्न बाद में करते हैं पहले यह जानते हैं कि पाप क्या है?
🌻 *वेदों में पाप की परिभाषा*🌻

*ओ३म् परोपेहि मनस्पाप किमशस्तानि शंससि।*
*परोपेहि न त्वा कामये,वृक्षां बनानि संचर गृहेषु गोषु मे मन:!!*
यह अथर्वेद कांड-६ सूक्त-२३ का मंत्र संख्या ३ है। मंत्र का अर्थ इस प्रकार है!
हे मेरे मन के पाप! तू दूर हट जा।यह क्या निंदनीय भावनाएं दे रहा है? दूर हट जा। मेरा मन वृक्षों और बनों की शोभा देखने और गौओं के उपकार मय रुप में संलग्न है।
इस मंत्र द्वारा लक्षित हो रहा है कि पाप जीवात्मा तीन साधनों से करता है।शरीर,वाणी,और मन से!
🍁 *शरीर से होने वाले पाप*🍁
शरीर से तीन प्रकार के पाप सारे जीवात्मा करते हैं।
[१] हिंसा [२] चोरी [३] व्यभिचार।
🍁 *वाणी से होने वाले पाप* 🍁
वाणी से चार प्रकार के पाप जीवात्माओं से होते हैं।
[१] झूठ बोलना [२] कठोर बोलना [३] निंदा-चुगली [४] मिथ्याभाषण।
🍁 *मन से होने वाले पाप* 🍁
मन से तीन प्रकार के पाप होते हैं।
[१] द्वेष [२] परधन इच्छा [३] नास्तिकता।
ये बातें मनु -स्मृति में महर्षि मनु कहते हैऔर महर्षि मनु ने इन पापों से मुक्त होने के लिए शरीर,वाणी,मन से पुण्य करने की विधि भी बताई है।
🍁 *शरीर से तीन पुण्य🍁*
[१] अहिंसा [२] दान [३] सेवा
🍁 *वाणी से चार पुण्य* 🍁
[१] सत्य बोलना [२] मधुर [३] सरल [४] हितकारी।
🍁 *मन से तीन पुण्य* 🍁
[१] अस्पृहा [२] दया [३] आस्तिकता।
🍐 *शंकराचार्य जी से प्रश्न ?*🍐
आदि गुरु शंकराचार्य द्वारा स्थापित शंकराचार्य जी के वर्तमान प्रतिनिधि श्रीमान् शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद जी से निवेदन है कि इन प्रश्नों का उत्तर दें।
*[१]* सनातन शब्द वैदिक है जबकि हिंदू शब्द किसी भी सनातन ग्रंथ में नहीं है फिर आपने सनातन हिंदू कैंसे कह दिया?
*[२]* आदिगुरु शंकाराचार्य जी के समय में शैवमत था,बौद्धमत था,जैनमत था न हिंदू धर्म था न हिंदू ।आप उनके प्रतिनिधि हैं फिर आप हिंदू शब्द का प्रयोग कर आदि गुरु शंकराचार्य जी का अपमान क्यों कर रहे हैं?
*[३]* हिंदू शब्द तो मुगलकाल में प्रयोग में आया है यानि आज से मात्र १६०० वर्ष पूर्व जबकि कुंभ,अर्धकुंभ,महाकुंभ तो आर्य संस्कृति यानि सृष्टि के आदि काल यानि १,९६,२९,५३,१२५ वर्ष से चला आ रहा है ।तब सत्य सनातन संस्कृति आर्यों कै आपने सनातनी हिंदू व आर्य समाजी हिंदू कहकर अपमानित क्यों किया?
*[४]* महाराज मनु ने पाप और उनसे मुक्त होने के लिए किए जाने वाले पुण्य कर्मों को भी बता दिया।इसमें तो कहीं भी गंगा स्नान से पापों की मुक्ति का वर्णन नहीं किया तो क्या आप महर्षि मनु से भी अधिक धर्मज्ञ हैं?
*[५]* आप तो क ई बार गंगा स्नान कुंभ में किये हैं।कृपया हमें भी बतायें कि आपने कौन से पाप किये थे और गंगा स्नान करके वो कैंसे धुल गये? ताकि हम लोग भी आपका अनुकरण कर सकें?
🏵️ *शास्त्रार्थ निवेदन* 🏵️
आपको आपके अशास्त्रीय वचनों के कारण क ई बार आर्य विद्वानों ने चुनौती दी है मगर आप हमेशा भाग जाते हैं।इस बार हम आपको चुनौती नहीं निवेदन करते हैं कि आएं मिलकर सत्य -असत्य का निर्णय करें।आप अकेले असत्य पर चलें हमें इसकी परवाह नहीं है मगर लाखों भोले-भाले लोगों को भी आपने भटका रखा है धर्म के विसय मैं हम चाहते है उनके साथ न्याय हो! आप जहां कहें।जब कहें हम आपके के साथ शास्त्रार्थ करके समाज को सत्य पथ पर चलाना चाहते हैं।
🌸 *पाप भोगने पड़ते हैं!*🌸
आदरणीय शंकराचार्य जी महाकुंभ पर स्नान करना बुरा नहीं है।मगर अकाट्य सत्य यह भी है कि पाप न तो मांफ होते हैं।न ही कटते हैं।पापों को जो करता है उसी को भोगना पड़ता है।चाहे हम हों या आप या कोई और।जो भी पाप करेगा उसे भोगना पड़ेगा।गंगा एक नदी है उससे शरीर की शुद्धि होती है न कि शरीर के पाप कटते हैं। उसी प्रकार वाणी व मन के पाप भी भोगने ही पड़ेगें।आपने कहा है कि गंगा स्नान से पापों से मुक्ति होती हैयह शतप्रतिशत झूठ है।इस झूठ का भी पाप भोगना ही पड़ेगा।
🌹 *आर्य समाज का भय*
शंकराचार्य जी की समस्या ये है कि आर्य समाज ही विश्व की एकमात्र संस्था है जो *सत्या-सत्य का निर्ण* करती है।पाखंड का खंडन व सत्य का मंडन करती है।ऐंसे शंकराचार्य जी को लगता है कि मेरी कौन सुनेगा? मगर आर्य समाजक्षकिसी से द्वेष नहीं करता अपितु *सहिष्णुता पूर्वक विश्व को एक संस्कृति ।एक ध्वज एक धर्म* के नीचे लाकर मानवता का विस्तार करता है और करता रहेगा।कुंभ में *जिज्ञासु* भी भारी मात्रा में आते हैं उनकी भूख केवल आर्य समाज ही मिटा पाता है। *आर्य समाज के बिना तो कुंभ अधूरा* ही रहता है।
आपका शुभेच्छु
आचार्य सुरेश जोशी