अनुराग लक्ष्य, 3 जनवरी
सलीम बस्तवी अज़ीज़ी
मुम्बई संवाददाता ।
सच है, इंसान की जिंदगी भी इस दुनिया में कितने रंग बदलती है, पल पल, लम्हा लम्हा, लेकिन इंसान शायद इस बदलाव को वक्त पर महसूस नहीं कर पाता। इसी लिए जब बहुत कुछ हाथ से निकल जाता है तब उसे होश आता है कि ज़िंदगी हमें बहुत पीछे छोड़ कर बहुत आगे बढ़ गई, और हम रास्ते के मुसाफिर बनकर रह गए।
निगाह जिधर भी जाती है सिर्फ मायूसी और अंधकार के इलावा कुछ हाथ नहीं आता। लोग अपना सफर तय करके बहुत आगे बढ़ गए और मैं वहीं का वहीं अभी तक खड़ा हूँ। एक हारे हुए खिलाड़ी की तरह, और तब ज़बाँ पर यह बात आ ही जाती है कि,
,,, ज़िंदगी जब उदास होती है कोई साया क़रीब होता है,
सबको सब कुछ तो मिल नहीं सकता, अपना अपना नसीब होता है,,,,
,,,,, मैं इस दुनिया में क्या हूँ यह किसी से कह नहीं सकता,
मगर जो सच है उसको भी कहे बिन रह नहीं सकता,
मैं वोह दरवेश हूं इस दौर का तेरी हुकूमत में,
कि जैसे बह रहा है तू मैं हरगिज़ बह नहीं सकता,,,,,
,,,, मौत ने ज़िंदगी को घेरा है,
आज बोझिल मेरा सवेरा है,
रात जुगनू ने आके मुझसे कहा,
कुछ न तेरा यहाँ न मेरा है,,,,