परीक्षा-महोत्सव२०२४-आचार्य सुरेश जोशी

🌹 ओ३म् 🌹
*परीक्षा-महोत्सव२०२४*
प्रतिवर्ष की भांति इस वर्ष भी माह दिसंबर में परीक्षा महोत्सव का पर्व अत्यंत हर्षोल्लास के साथ सम्पन्न हुआ। इस वर्ष परीक्षा का विषय रहा 📚 *अथर्वेद कथा* अथर्वेद का प्रतिपाद्य विषय है विज्ञान।विज्ञान यानि अनुभव में आया हुआ परिपक्व ज्ञान।एक माह तक अथर्वेद के अंदर जो *योग विज्ञान* को प्रतिपादित किया है उसको विस्तार से समझाया गया है।
अथर्वेद की वाणी को अपने अंत:करण में *महर्षि अंगिरा* ने श्रवण किया।जिस योग से परमात्मा का साक्षात्कार होता है उसका वर्णन अथर्वेद में इस प्रकार से है।
*अष्टचक्रा नवद्वारा देवानां पूरयोध्या।*
*तस्यां हिरण्यय: कोश: स्वर्गो ज्योतिषावृता:।।*
अथर्वेद१०/२/३१
मंत्र का पदार्थ इस प्रकार है। 🌸 अष्टचक्रा = यम,नियम,आसन,प्राणायाम,प्रत्याहार,धारणा,ध्यान व समाधि इन आठों का क्रम रखने वाली।🌸 नवद्रारा= सात मस्तष्क के छिद्र+एक मन+एक बुद्धि रुपी नौ द्वार वाली 🌸 पू= देहपुरी 🌸 देवानाम् = उन्मत्तों के लिए 🌸 अयोध्या= अजेय है।🌸 तस्याम्= उस पुरी में 🌸 हिरण्यय:= अनेक बलों से युक्त 🌸 कोष:= भण्डार अर्थात् चेतन जीवात्मा 🌸 स्वर्ग:=सुख स्वरुप परमात्मा की ओर चलने वाला 🌸 ज्योतिषा = ज्योति प्रकाश स्वरुप ब्रह्म से 🌸 आवृता:= छाया हुआ है।
अर्थात् मानव शरीर ही सच्चा मंदिर है जिसे भगवान ने स्वयं बनाया है।केवल बनाया ही नहीं उसमें जीवात्मा को भी रखता है साथ में स्वयं भी रहता है।मानव देवपुरी में एक स्थान है *हृदयाकाश* इसी हृदयाकाश में जीवात्मा व परमात्मा *व्याप्य-व्यापक भाव से अनादि काल से रह रहे हैं* ।
अब प्रश्न उठता है कि हृदयाकाश में रह रहे प्रभु का साक्षात्कार कैंसे हो? इसी का उत्तर मंत्र के 🌸 *अष्टचक्रा पद* 🌸 में दिया है।यानि *यम,नियम,आसन,प्राणायाम,प्रत्याहार,धारणा,ध्यान,समाधि* इन उपायों को व्यवहार में लाने से ईश्वर सा साक्षात्कार इसी मानव शरीर में ही होता है।
मगर *आश्चर्य इस बात का है कि लोग परमात्मा के बनाये मंदिर में ईश्वर का ध्यान नहीं करते* अपितु मनुष्य के बनाये मंदिर मे उसकी पूजा करते हैं।मनुष्य के शरीर रुपी मंदिर में स्वयं परमातृमा ने प्राण प्रतिष्ठा की है जिनकी संख्या १० है।मगर मनुष्य के बनाये मंदिर में मनुष्य द्वारा की गयी प्राण प्रतिष्ठा वाले मूर्तियों की पूजा करता है जबकि उसमें प्राण प्रतिष्ठा होती भी नहीं।* *क्योंकि प्राण का काम चलना,उठना,बैठना,जागना,बोलना,मल-मूत्र विसर्जन करना है।*
जबकि भगवान जिस शरीर में प्राण प्रतिष्ठा करता है उसमें प्राण सारे काम करता है।यदि मनुष्य इस तरह विचार करे तो वह सच्चे ईश्वर तक पहुंच जायेगा। अथर्वेद के इस विज्ञान से ही *महर्षि पतंजलि जी ने योग दर्शन शास्त्र* की खोज की है।क्योंकि सब सत्य विद्याओं का आदि मूल *वेद* ही है।
एक माह तक चलने वाले इस अथर्वेद कथा का समापन 🪔 *परीक्षामहोत्सव* 🪔 के रुप में हुआ।इस अवसर पर जो परीक्षा हुई उसमे भाग लेने वाले परीक्षार्थियों ने जो पुरस्कार प्राप्त किया उनकी सूची इस प्रकार है।
🪷 *प्रथम श्रेणी* 🪷
[१] माता भानु जी वैकुंठ विहार।
[२] बहन प्रमीला।
[३] ब्रह्मचारिणी मिष्ठी।
🪷 *द्वितीय श्रेणी* 🪷
बहन निर्मला दवे।
🪷 *तृतीय श्रेणी*🪷
गोवर्धन परवाणी
🪷 *सांतवना पुरुष्कार*🪷
जीतू भाई जी,देवभाई जी,बाला मयानी जी,पुष्पा टिंडवाणी जी,नानकी भाटिया जी,नानकी द्वितीय जी,सत्यनारायण जी,अनिल लालवाणी जी,श्यामलाल के०पी० जी,लाजवंती जी, सुरेश दवे जी,रेश्मा जी,सिंधू जी,आर्या जी,संतोष जी
🏵️ *प्रतिष्ठित यजमान*🏵️
अथर्वेद कथा के प्रतिष्ठित यजमान *श्रीमती दीपा एवं श्रीमान वेदप्रकाश दलवाणी* जी रहे!
🌻 *परीक्षा-प्रभारी*🌻
परीक्षा -प्रभारी का कुशल नेतृत्व पंडिता *रुक्मिणि शास्त्री* बाराबंकी उत्तर प्रदेश ने किया।
🍁 *आभार प्रस्तुति*🍁
आर्य समाज सैजपुर के संरक्षक *आदरणीय हरिभाई* ने सभी परीक्षार्थियों को पुरुष्कार प्रदान किया।उन्होंने अपने उद्बोधन में सभी परीक्षार्थियों को हार्दिक शुभकामना देते हुए कहा *वैदिक धर्म* का प्रचार -प्रसार आज के युग की प्रथम व अनिवार्य आवश्यकता बन चुकी है जिसे हम सभी को मिलकर करना है।इसका एकमात्र उपाय है कि हम कम से कम *प्रत्येक रविवार को सपरिवार आर्य समाज म़ंदिर* में जाकर वैदिक धर्म की शिक्षा ग्रहण करें।
आचार्य सुरेश जोशी
*प्रवासीय कार्यालय*
आर्य समाज मंदिर सैजपुर बोघा अहमदाबाद गुजरात!