हिंदी साहित्य में गीतिकाव्य परंपरा काव्य की धारा की एक ऐसी धारा है जो गेय रूप में सबसे अधिक जनमानस में प्रिय रहा है हिंदी कवियों में प्रदीप जी ऐसे ही हस्ताक्षर के रूप में ,नीरज जी उसी धारा के बड़े हस्ताक्षर हैं जिन्होंने हिंदी गीत को एक आधार दिया !नव गीतकारों ने इसे बड़े रूप में रेखांकित किया! इसी धारा में एक नया बिल्कुल नया नाम प्रवासी साहित्यकार श्री सुरेश पांडे का भी है उन्होंने हिंदी काव्य धारा के बहाने गीतों को अपने मन की अनुभूति से गाने का प्रयास किया है उनका नवीनतम बिल्कुल आधुनिक गीतिकाव्य ‘मुस्कुराता रूप तेरा ‘आज के समय में हिंदी गीतिकाव्य में एक चर्चित गीतिकाव्य बना हुआ है
सुरेश पांडे हिंदी साहित्य के ऐसे गीतिकाव्य के रचयिता है जिन्होंने अपने 40 साल के प्रवास को सजोया है और मुस्कुराता रूप तेरा के सभी 50 गीतों में वह उभर कर आया है कहने को तो वह काव्य के सार्थक प्रहरी है पर गीतों की अभिव्यक्ति उनमें एक संचार भरती है उन्हें सुकून देती है और वह गुनगुनाते एक गीतिकाव्य की रचना कर देते हैं पिछले 40 वर्षों के जीवन को गीतिकाव्य के कंठ से परिभाषित करने का प्रयास है उनके गीतो का शिल्प सामान्य है पर उनकी अभिव्यक्ति बड़ी ही मार्मिक है उनके शिल्प को संदर्भित करते हुए श्री अशोक चंद दुबे ने मुस्कुराता रूप तेरा में लिखा ‘इस काव्य संग्रह में इसका आकार अर्थात शिल्प की विविधता की विशेषता और उसके कथानक में अनोखापन कवि सुरेश पांडे की पहचान है’ स्वयं सुरेश जी ने स्वीकार किया है ‘कि इसके गीत मेरी जुबान पर चढ़े हुए रहे हैं मेरे एकांत के साथी हैं आज तुम्हें मैं समाज के साथ साझा कर रहा हूं इसमें कुछ ऐसी भी चीज हैं जो मेरी नितांत वैयक्तिक है ‘
सुरेश जी के गीत मौलिकता के ऐसे गीत है जिसमें उनका यथार्थवादी एहसासी विचार संदर्भ व्यक्त हुआ है शिल्प एवं अलंकार का सहारा बस कल्पना के लिए हुआ है डॉ जयशंकर शुक्ला ने लिखा है कि’ उसमें व्यक्त विचार भाव और शिल्प के लिए धन्यवाद देता हूं विभिन्न संदर्भों एवं विचारों की प्रमाणिकता से गीतकार के विद्वत जनों ने उन्हें यथार्थवादी गीतिकाव्य रचयिता मान लिया है जो सही है क्योंकि उन्होंने कभी भी कल्पना को बस सहयोग के रूप में रेखांकित किया है इसलिए वह पाठकों के बीच प्रिय है आज के रचनाकार कल्पनाओं के राजकुमार हैं यथार्थ से दूर है जो बिल्कुल सही नहीं है मेरा मानना है सुरेश जी यथार्थ के बहाने अपने गीतों को एक नया संबल देते हैं जिससे पाठक उनकी रचना प्रक्रिया के प्रति आकर्षित होता है सुरेशजी के गीतिकाव्य मुस्कुराता रूप तेरा में वही एहसास ,संवेदना , जो यथार्थ के धरातल पर जिसकी नींव है उसे उन्होंने वास्तविक चश्मे से देखने का प्रयास किया है काव्य की अभिव्यक्ति उनमें रची बसी है इतने वर्षों से प्रवासी रूप में स्वीडन में रहते हुए वह अपने उत्तराखंड के संस्कारों से याद करते हुए मनसुख पाते हैं वह उसे अपने गीतों में लिखते हैं
देवभूमि के स्वप्न सलोनी मेरे मन को भाते हैं/देवभूमि के भाव अनोखे मुझ में सुख उपजाते हैं
मैंने अपना जीवन सींचा देवभूमिके संस्कारों से
मुझ में मेरी आन बान है मेरी धरती के नारों से!
सुरेश जी के गीतों में यथार्थ है जो उन्हें यह अन्य गीतोंकारों से पृथक करता है गीतों में शब्दों का संयोजन इतना सरल और सहज है कि सामान्य पाठक भी आसानी से गुनगुना कर अर्थ तक पहुंच जाता है जो सुरेश जी की बड़ी सफलता है उनका गीतिकाव्य छायावाद की काव्य रचना प्रक्रिया से विशेष प्रभावित है और समय की परिधि और पतझडो के पत्तों से बात करते हुए अपने ‘पात कितने झड़ चुके हैं’ गीत काव्य में उसे व्यक्त करते हुए लिखते हैं
उम्र कितनी /ढल चुकी है/ क्या गिनूं मैं/ साल इसके पात कितने /झड़ चुके हैं /क्या गिनूं में /पतझड़ों को क्या कहूं।
अपने हृदय की बात छोटे /और बड़ों को!
प्रेम गीत सभी गीत काव्य कवियों ने लिखे हैं सुरेश जी भी उसे पृथक नहीं है उनका प्रेम संदर्भ ‘तेरी यादों ने’ गीति काव्य में एक शास्वत प्यार दिखता है वह लिखते हैं
सावन सारी/रीत गये हैं /मौसम सारे/ बीत गए हैं
कोई ऐसी/ सांस न आई /कोई ऐसी आप ना आई/ तेरी मुस्कानों /का हमने/ रोज यहां पर /झरना देखा /फूल खिले जिस/ भी बगिया में/ उसने तेरा/ खिला देखा
मुस्कुराता रूप तेरा गीतिकाव्य के शब्दों की क्यारी में खुद की तलाश शीर्षक में सुरेश जी लिखते हैं ‘इस संग्रह में कुल 50 गीत मैंने अपने जीवन भर की यात्रा को अलग-अलग रूपों में व्यक्त किया है यहां पर आज मेरे आयु को लेकर इस संग्रह का मूल्यांकन करने की कोशिश मत कीजिए क्योंकि यह यहां 18 साल के सुरेश पांडे ने भी लिखा है और 65 साल तक आते जीवन के बीच पड़ाव में मेरे द्वारा लिखी गई रचनाओं को यहां पर संग्रह में संग्रहीत किया गया है जिसमें मेरे भाव मेरी थाती के रूप में है वक्तव्य से स्पष्ट है कि सुरेश जी ने इस संग्रह में अपने गीतों में उम्र के सभी पड़ाव को जैसा-जैसा होगा उसे अपने गीतों में स्थान दिया है उम्र के हर पड़ाव को उन्होंने अपनी स्मृतियों में सजोया है प्रारंभिक उम्र का एक गीत ‘इन सपनों में क्या’ वह गुनगुनाते हुए लिखते हैं
जुड़ जाता हूं /किस-किस से मैं /नहीं पता यह अब तक मुझको/ अपने दिल में/ कितने सपने अभी जगाने हैं फिर मुझको / अफसाने भी /अभी सुनाने है फिर मुझसे
सुरेश जी ने गीतों के अपने रचना संसार में हर भावों को बड़े भाव से निर्मित किया है बस उसकी विशेषता है कि वह पाठक को बड़े आसानी से समझ में आ जाते हैं इसलिए प्स्मृतियों का संदर्भ उनमे बराबर बना रहता है वार्ता कम सदैव उनके गीतों को कुछ नए रूप में देखते हैं ‘आंसुओं का एक झरना” गीत में कई संदर्भ इसकी प्रामाणिकता सिद्ध करते हैं वह लिखते हैं-
आंसुओं का/ एक झरना/ बह रहा है/ कुछ हमारी हसरतों का/ प्यार इसमे बह रहा है /यह हमारी/ धड़कनों का/ हाल हमसे कह रहा है
वह ऐसे गीतिकाव्य रचनाकार हैं जो स्मृतियों में रहकर सपनों को सजोते हैं जहां जीवन की कई अमराईया है’ लौट आओ घोसले में’ गीत के प्रत्येक संदर्भ इसके प्रतीक रूप में संदर्भित है
शाम के/ लम्हे चले हैं /पंछियों को /यह बताने लौट आओ/ घोसलों में /रात के हैं /ये ठिकाने कल नहीं/ देखा किसी ने /कह रहे हैं /ये दीवाने
एक जीवन /एक दिन का/ कट चुका है /जो यहां पर/ जिन उम्मीदों/ से भरा था/ घट चुका है/ वो/यहां पर
सुरेश जी के गीतों में विविध संदर्भ है मुस्कुराता रूप तेरा संग्रह में उनके 40 वर्षों का स्मृति संयोजन है जिसमें जीवन के अनेक रंग है उन्हें रंगों में एक रंग प्रदूषण से बचने का रंग भी है ‘आग की चिंगारियां पर ‘गीत में वह प्रदूषण से मुक्त होकर खुले वातावरण में रातरानी की फिज़ा में गुनगुनाना चाहते हैं वह लिखते हैं
सांस कैसे/ ले रहे / हम यहां /अपने नगर में
किस तरह से घुट रहे / हम यहां/ अपने नगर में
क्यों फूंक कर /अपने चमन को/ हम जहर में ?
योजना कोई/ नहीं है /जो प्रदूषण/ को घटा दे!
————————————
काश खिलते/ फूल होते/ खुशबुओं से /तर हवा में/ गुनगुनाते/ गीत होते रात रानी की/फिज़ा में
उनका गीत संदर्भ हमेशा नए संदर्भों को लेकर कुछ बड़ा संदर्भ रचता है ‘मन की दीपावली ‘नामक गीतिकाव्य दीपावली के प्रति मानव को भिन्न-भिन्न संदर्भ में व्यक्त करता है दीपावली पर्व हर समय को प्रतिमानों में रेखांकित करता है
दीप मन का /जब जल तो/ मन गई दीपावली /यह अंधेरा /खास है कुछ जो दियो /से ही हटेगा /एक धीमी रोशनी ले /यह किनारों /पर रहेगा फूल दिल का /जब खिला तो/ बन गई दीपावली
————————————
झीलमिलाती /क्यों इसी में /यह विरल /दीपावली
————————–
क्यों अमावस/ की निशा में/ छा गई दीपावली
सुरेश जी ने गीतों के लिए कोई पूर्व पीठिका नहीं बनाते जैसे भाव एहसास आते हैं वह उसे अपने गीति काव्योंमें उतारतेचलते हैं ‘नैनो के द्वार’ गीत में वह उन्हीं संदर्भों से नैनो से झर जाने की बात करते हैं वह लिखते हैं
कुछ भी ऐसा /नहीं यहां पर/ जिसमें सांसे/ रुक जाती
हो/ ये नयनो के /द्वार यहां क्यों
——————————-
सम्मोहन हो/चाहे कितना /मेरे दिल से/ तेरे दिल तक / मन के सारे /आकर्षण भी/ धीरे-धीरे/ गह जाते हैं
झरने सारे
बह जाते हैं
उनकी गीतिकाव्य रचना विधान हमेशा स्मृतियों के बीच की गुनगुनाते है वहां कोई भी बनावटी पन देखने को नहीं मिलता है जैसा मन में गुनगुनाया है वैसा ही कैनवास पर उतारा है अपने गीतों के सरोवर में उनके गीत एक प्रयोजन में नहीं रखे गए जैसा संदर्भ मिला उसे ही गीतों में पिरो दिये इसलिए सुरेश जी के गीतों मे विविध रूपो में उतरे हैं इसलिए सभी परिणिति उन्हें मालूम है उनका गीतिकाव्य उनके जीवन के 40 वर्षों का चालीसा भी है जो उन्होंने गीतों के माध्यम से गाने का प्रयास किया है और यह प्रयास इसलिए सार्थक भी है क्योंकि सभी अर्थों में गया है गुनगुनाया है विभिन्न कार्यक्रमों एवं आयोजनों के माध्यम से उसे रेखा अंकित करने का प्रयास किया है वह लिखते हैं-
एक समुंदर /लहराता था/ धीरे-धीरे मन /गाता था/ कितने जन्मों /का नाता था /मुझे पता है/ तुम्हें पता है
———————————–
अगणित मन/ की आशाएं थी /क्या-क्या /जाने छू लेती थी /नहीं पता था/ हम दोनों को/ थाहे मन की /ले लेती थी
वह अधरो की/ बातें सारी /अधरो पर ही/ लिखी हुई है /कौन किताबों को पढता है /ताजमहल पर /खुदी हुई है /ताजमहल /बनवाया किसने/ मुझे पता है/ तुम्हें पता है
उपरोक्त गीतिकाव्य पंक्तियों से पता चलता है कि सुरेश जी अपने गीतों को अगणित ज्यामितीय संदर्भों और इतिहास के साक्ष्य से परिभाषित करते हैं जो उनकी गीतिकाव्य की एक महत्वपूर्ण विशेषता है वह गीतिकाव्य में स्मृतियों को ऐतिहासिकता से भी जोड़ते हैं जिससे स्मृतिया भी जीवंत सी लगती हैं कहने को तो उनका गीत का संसार हमेशा विविध रूप में निर्मित रहा है पर देखा जाए तो छायावाद की भावानुभूति उनके गीत का मुख्य आधार है उनके गीतों में कल्पना का रूप बस अलंकार, प्रतीक , शिल्पो के साथ बस कैनवस को थोड़ा बड़ा कर इस रेखाकित करने का प्रयास है इसके अतिरिक्त कुछ भी नहीं वह ऐसे गीत काव्य रचनाधर्मी है जिन्होंने अपने पहले गीतिकाव्य मुस्कुराता रूप तेरा से हिंदी काव्य के रचनाकारों को विवश किया है वह अपने मूल संदर्भों की ओर लौटते और उनके संदर्भों को अपने गीतिकाव्य का विषय संदर्भ रखा जिसका उन्होंने एहसास किया या भोगा ह
सुरेश जी ने गीतिकाव्य में अपने उन संदर्भों को व्यक्त किया है जिसमें उनका 40 वर्षों की चालीसा का गान है अपने गीतों से उन्होंने गीतकार को मजबूत किया है इसी गीतिकाव्य संग्रह के शब्दों से भाव के चित्रण शीर्षक में। डा जयशंकर शुक्ला ने ठीक ही लिखा है मैं इस संग्रह की कविताओं के लिए और उन में दर्द विचारों भाव शिल्पो के लिए सुरेश पांडे को सहदय धन्यवाद देता हूं उनके उन सभी प्रशन उन सभी माध्यमों को उन सभी प्रेरक स्थितियों को जिनके कारण वह इस तरह की रचनाएं कर सके
मुस्कुराता रूप तेरा की रचनाएं अलग-अलग रूप आकारो के लिए हुए नवीनता की ओर कवि के मंतव्य को अग्रसित करती है यहां पर कोई दोहराव नहीं है वरन गतिशीलता है निरंतर नए नए अलख जलाते हैं जो सुरेश पांडे की जीवन से जुड़ते हैं उनके जीवन यात्रा की एक सकार व सार्थक गवाह है जिसे शब्दों के रूप में व्यक्त किया गया है
डॉ जयशंकर शुक्ल के इस वक्तव्य से साफ स्पष्ट होता है कि सुरेश पांडे का गीतिकाव्य विभिन्न संदर्भों का एक ऐसा पुष्प गुच्छ है जिसमें नाना प्रकार के संदर्भ है और विषय जिसे सुरेश जी ने अपने प्रवासी जीवन के 40 वर्षों के अनुभव एवं विचारों को अपने लेखन में पिरोया और उसे लिपिबद्ध गीत काव्य में रच कर जन के बीच प्रस्तुत कर अपनी स्मृति संयोजन को आधार दिए हैं जो गीतिकाव्य की दुनिया में एक बड़ा संदर्भ है
आज हिंदी साहित्य में गीतिकाव्य परंपरा में जो काव्य रचना संदर्भ एक विशेष रूप में लिखा जा रहा है जहां कल्पना की अधिकता है लेकिन सुरेश पांडे ने अपने गीतिकाव्य के माध्यम से गीतिकाव्य के रचनाकारों को यह संदेश देने का प्रयास किया है कि यथार्थ और एहसास के द्वारा ही हम गीतिकाव्य को और पुख्ता कर जन के समझ प्रस्तुत कर सकते हैं मेरा मानना है कि सुरेश जी ने अपने जीवन के उन संदर्भों को भी अपने गीतिकाव्यों में उतारा है जिससे प्रायः हिंदी लेखक वास्तविक रूप में बचते हैं किंतु सुरेश पांडे ने अब तक अपने लेखन के सभी संदर्भों को वास्तविक रूप में व्यक्त किया है जो किसी भी रचनाकार की के लिए कठिन होता है सुरेश जी का मानना है जो रचनाकार वास्तविकता से दूर होगा वह अपनी रचना से न्याय नहीं करता है इसलिए उनकी रचना का संदर्भ अन्य रचनाकारों के अलग है और आज के समय में गीतिकाव्य परंपरा के सच्चे साधक है