
अनुराग लक्ष्य, 20 अक्टूबर
मुम्बई संवाददाता।
कहते हैं कि इंसानियत का कोई धर्म और मज़हब नही होता बल्कि इंसानियत पूरे धर्म और मज़हब को अपने अंदर खुद समेट लेती है।
इसी परंपरा को आगे बढ़ाते हुए कलम के यह दो सिपाही अपनी रचनाओं के माध्यम से समाज में एकरस्ता और मुहब्बत के साथ इंसानियत की डोर को मज़बूत कर रहे हैं। प्रस्तुत हैं आज इनके कुछ कलाम।
पूनम विश्वकर्मा,,,
1/ जिसे मैने चाहा था हद से गुज़रके,
मैं खुद में उभर आई उसमें उतरके ।
2/ थी उम्मीद जिससे कि ज़ाहिर करेगा,
रखा है उसी ने मुझे राज़ कर के ।
3/ चढ़ा दे मुहब्बत की सूली पे चाहे,
मगर ज़िंदगी भी दे बाहों में भर के ।
4/ बुझेगी तभी आग तेरी मुहब्बत,
मुझे जब जलाएगी मुझमें ठहरके।
5/ अगर वोह करे मरते दम तक का वादा,
तो वादा निभाऊंगी उसका मैं मरके।
सलीम बस्तवी अज़ीज़ी,,,,
1/ ऐ खुदा आज की शब लाल ओ गुहर हो जाए
ख्वाहिश ए दिल है कि तैबा का सफर हो जाए ।
है तमन्ना यही ज़िंदा हैं जो तारीकी में,
ऐसे इंसानों की दुनिया में सहर हो जाए।।
2/ मैं मुहब्बत को ज़माने में आम करता हूं
जब भी करता हूं मैं शीरीं कलाम करता हूं।
हैं जितने समयीन आज की इस महफ़िल में
बहुत अदब से सभी को सलाम
करता हूं।।
3/ है कितना प्यारा वोह सब्ज़ गुम्बद तुम्हें यह शायद ख़बर नहीं है,
मेरी नज़र से जो देखे उसको किसी की शायद नज़र नहीं है।
सलीम दिल की बहुत है ख्वाहिश कि शहर ए बग़दाद मैं भी जाऊं,
सबब ज़ईफी बनी यह अपनी बचा भी कुछ माल ओ ज़र नहीं है।।