“”दिन बचपन के….””
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मां की गोद बाप की छाया, हंसता था मन हंसती काया। चिड़िया, गिल्लू दोस्त हमारे, भूल गई वह सारी माया।।
जीवन आए दिन उलझन के, बीत गए प्रिय दिन बचपन के।।1।।
माटी के थे खेल खिलौने, धरती मां की गोद बिछौने। बालू में मिल बने घरोंदे ,
गोली से हम करते सौदे।।
घिर आए दिन उमस तपन के।
बीत गए प्रिय दिन बचपन के।।2।।
उंगली पकड़ के मेला जाते, लैया ,पट्टी लेकर खाते।
वहां झूलते काठ के घोड़े, गुब्बारे खूब मिलकर फोड़े।।
अब मिले न रोटी बिना जतन के ।
बीत गए प्रिय दिन बचपन के।।3।।
रो रो कर विद्यालय जाते, चूरन कैथा मिलकर खाते। चुस्की कुल्हड़ में पीते थे, अपना जीवन खुद जीते थे।।
आंख हो गई बिन अंजन के। बीत गए प्रिय दिन बचपन के।। 4।।
दादा चाचा खेत घूमाते,
हाथ पकड़ कर नदी नहाते। रोज सुनाती दादी लोरी,
भैया से कर लेता चोरी।।
काम न होता बिना सुधन के।
बीत गए प्रिय दिन बचपन के।।5 ।।
आज नहीं रक्षित बचपन है, अंधा युग से घिरा चमन है। रक्षित नहीं देश की सीमा, नहीं बची सिंदूर की गरिमा।
राखी हाथ हुए कंपन के,
बीते दिन अनुपम बचपन के।।6।।
गोपाल त्रिपाठी
शांतिपुरम
प्रयागराज
9889609950