करुणा घर-घर है छाई -प्रतिभा गुप्ता ‘प्रबोधिनी’

गीत
*करुणा घर-घर है छाई*

दुनिया के हालात देख जब घूँट गरल का पीते हैं।
रात-रात भर जाग-जाग कर उन लमहों को जीते हैं।।

अपने छूटे सपने टूटे गहन समंदर सी खाई,
देख द्रवित हो गया हिमालय करुणा घर-घर है छाई।
देख-देख दुख इक दूजे का अपना मरम लपेटे हैं,
बिन बादल बरसात सदृश नैनों ने नीर समेटे हैं।
बिखरी-बिखरी सी बगिया में इनके सपने रीते हैं,
दुनिया के हालात देख जब घूँट गरल का पीते हैं।।

कहीं धर्म खोयी मानवता,कहींकर्म का लेख प्रबल,
निर्बल को बल देने वाली मानवता है कहीं सबल।
इक-इक लमहा हार-हार कर इक-इक लमहा जीत रहे,
साहस कभी न खोने पाये प्रीति सदा ही मीत रहे।
रिश्तों की उधड़ी बखिया फिर प्रेम डोर से सीते हैं,
दुनिया के हालात देख जब घूँट गरल का पीते हैं।।

साँस घुटी जिनकी ‘प्रतिभा’ उन घुटती साँसों से पूछो,
पीपल नीम और बरगद से निकली आहों से पूछो।
कौन दिलाशा देगा माँ को जिसने खोये प्यारे हैं?
जो भविष्य हैं पूर्ण सृष्टि के और आँख के तारे हैं।
क्षति उनको क्यों जिनके कुछ ही दिन दुनिया में बीते हैं,
दुनिया के हालात देख जब घूँट गरल का पीते हैं।।

प्रतिभा गुप्ता ‘प्रबोधिनी’
खजनी, गोरखपुर

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