इंसानियत ही मुल्क है : फिदेल

 

सड़क पर रहने वाले लोगों के साथ बातचीत में सब कुछ अलग हो जाता है। वहां की बातें वास्तविक लगाव की एक खुरदुरी अनौपचारिकता से भरी होती है। वहां उसका एक ही नाम रह जाता है फिदेल। लोग उसे घेर लेते हैं और प्रगाढ़ता के संबोधन ट्यू (तुम) में पुकारते हैं। वे उससे बहस करते हैं, उसकी बात काटते हैं, उसे मांग करते हैं। यह एक निर्बाध संचार चैनल है जिसके जरिए सच की तेज धारा बहती रहती है। यूं अपनी छवि की चमक में घिरा यहां एक दुर्लभ मनुष्य है। ये वो फिदेल कास्त्रों है जिसे मैं जानता हूं। गाब्रिएल गार्सिया मार्केज ने जिस फिदेल को अपनेपन के साथ याद किया है उसी के अनुरुप फिदेल न केवल क्यूबा का वरन संपूर्ण विश्व का प्यारा तथा चहेता था। वह अपने कथनी करनी,संघर्षों तथा नीतियों से अपनी जो एक अलग पहचान बनाई वह वैश्विक जगत को एक नई दिशा देती है। क्यूबा को बटिस्टा की फौजी तानाशाही वाली अमेरिकी समर्थित सरकार से मुक्त करा कराके एक नए समाज के निर्माण के लिए पूंजीवाद,साम्राज्यवाद तथा उपभोक्तावाद के खिलाफ एक कड़ी चुनौती पेश किया। उसकी आजादी न केवल एक राजनैतिक उलट-फेर थी बल्कि समाजवाद तथा मार्क्सवाद की दिशा में एक चालक थी। सन 1961 ईस्वी में फिदेल ने जनता को संबोधित करते हुए कहा था कि हमारी शासन व्यवस्था समाजवादी शासन व्यवस्था है। और मिस्टर कैनेडी को कोई हक नहीं कि वे हमें बताएं कि हमें कौन व्यवस्था अपनानी चाहिए? हम सोचते हैं कि खुद अमेरिका के लोग भी किसी दिन अपनी इस पूंजीवादी व्यवस्था से थक जाएंगे। उसी समय कास्त्रों ने एक साक्षात्कार मार्क्सवाद के प्रति अपनी आस्था को जाहिर करते हुए कहा था कि मैं हमेशा मार्क्सवादी लेने वाली रहा हूं और हमेशा रहूंगा।
कास्त्रों न केवल अपने घोषणाओं तथा अहम् की संतुष्टि के लिए मार्क्सवादी बना रहा बल्कि उसके जीवन शैली तथा कार्य पद्धति में हम इसे आसानी से देख भी सकते हैं। उसने अपने नीतियों तथा योजनाओं से क्यूबा को कुछ ही वर्षों में फर्श से अर्श पर पहुंचा दिया। क्यूबा के क्रांतिकारी राष्ट्रीय कवि निकोलास गीय्येन ने उसे याद करते हुए लिखा है-
फिदेल
धारण किए हुए क्यूबा का नाम
सदा-सर्वदा के लिए
अपने भरोसेमंद सीने पर
फिदेल
वह शख्स
जिसने मिट्टी को
मेहंदी और जयपत्र की गरिमा दी।
फिदेल
वह शख्स
जिसने एक नया स्वदेश निर्मित किया
नफ़रत, कटुता और दरिंदगी से
सर्वथा मुक्त।
क्रांति के बाद जब क्यूबा की सत्ता कास्त्रो ने हासिल किया तो सबसे पहले बड़े किसानों तथा कंपनियों से जिनका एक बड़े भू भाग पर कब्जा था से बेदखल करके उन जमीनों को छोटे काश्तकारों तथा किसानों में बंटवारा कराया। छोटे काश्तकारों को खेती के लिए प्रोत्साहित किया। कृषि में गन्ने की खेती भरपूर की जाने लगी। गन्ने से जो शक्कर बनता उसका सोवियत संघ जैसे देशों में निर्यात किया जाने लगा। और इसके बदले पेट्रोल तथा अन्य आवश्यक वस्तुएं हासिल करने लगा। इतना ही नहीं जब देखा कि कृषि लाभ का पेशा न होकर घाटे का सौदा बनता जा रहा है जिससे किसान खेती करने से बचने लगे हैं। उसी समय से इसने जैसे भारत में बैंकों तथा अन्य बड़ी औघोगिक इकाइयों का राष्ट्रीयकरण करके उन्हें प्रोत्साहन दिया गया था। उसी तरह कास्त्रों ने भी क़ृषि का राष्ट्रीयकरण कर दिया। राष्ट्रीयकरण होने से खेत में काम करने वाले किसानों तथा मजदूरों को सामाजिक सुरक्षा, छुट्टियां, मुफ्त शिक्षा तथा इलाज की बेहतरीन सुविधाएं मिलने लगी। महज अपने आजादी के सात ही वर्षों के अंदर क्यूबा की 80 फीसदी भूमि पर सरकार का स्वामित्व हो गया। वहीं छोटे-छोटे किसानों को सहकारिता के माध्यम से प्रोत्साहन में निरंतर चलता रहा। पर एक दौर ऐसा भी आया जब जब सोवियत संघ जोकि क्यूबा के कृषि उत्पादों का प्रमुख खरीददार तथा ईंधन और रासायनिक उर्वरकों का आपूर्तिकर्ता था का विघटन हो गया। इसके कारण इसे भीषण मंदी का भी सामना करना पड़ा।‌ क्यूबा की कृषि उपज घटकर पचास फीसदी रह गई। पर कास्त्रों ने अपने दक्ष तथा देश के प्रति प्रतिबद्ध कृषि वैज्ञानिकों की मदद से खेती को नये हालातों के अनुकूल ढाल लिया। रासायनिक खेती के बदले जैविक खेती की जाने लगी। एक फसल के बदले विविध फसल चक्र अपनाएं गए। आज जब विश्व के अन्य देश जैविक खेती के विषय में सिर्फ कवायदें कर रहे हैं वहीं पर क्यूबा इस मामले में विश्व में बेहतर स्थिति में आ चुका है। जमीन के प्रत्येक टुकड़े का बेहतर इस्तेमाल करते हुए उत्पादन को पोषण युक्त बनाने में इस देश की कोई सानी नहीं है।
रवीन्द्रनाथ टैगोर ने कहा है कि देश का मतलब देश की मिट्टी से नहीं बल्कि देश की जनता से है। जब किसी देश की जनता शिक्षित, समझदार तथा अपने कर्तव्यों के प्रति सचेत होगी तभी वह देश अपने विकास पथ पर कदम बढ़ा सकता है। यदि हम अपने देश की शिक्षा पर नजर डाले तो यहां पर राष्ट्रीय साक्षरता मिशन की स्थापना सरकार द्वारा मई 1988 ईस्वी में की गई थी। जिसका मकसद 15 से 35 वर्ष आयु वर्ग के लोगों को शिक्षित करते हुए निरक्षरता का उन्मूलन करना था। वहीं पर 86 वें संविधान संशोधन द्वारा 6 से 14 साल की उम्र तक के सभी बच्चों को निःशुल्क एवं अनिवार्य शिक्षा का अधिकार दिया गया। फिर भी उस गति से निरक्षरता का उन्मूलन इस देश में अभी तक नहीं हो सका है जिस गति से क्यूबा में हुआ। इस देश ने 1 जनवरी सन् 1961 ई को एक लाख हाईस्कूल उत्तीर्ण लोगों के साथ पूरे मुल्क को साक्षर बनाने का अभियान शुरू किया।‌ यहां के जिम्मेदार लोगों ने इतना बाखूबी से इस अभियान को संचालित किया कि एक वर्ष पूरा होने के आठ दिन पहले ही क्यूबा एक पूर्ण शिक्षित राष्ट्र बन गया। 22 दिसम्बर सन् 1961 ई. को यह देश निरक्षरता रहित घोषित हो गया।
शिक्षा के साथ-साथ स्वास्थ्य की सुरक्षा एवं सुविधा भी किसी राष्ट्र की उन्नति का पैमाना हो सकता है। अभी कोरोना जैसी वैश्विक महामारी ने विभिन्न देशों के स्वास्थ्य सुरक्षा पर किए जाने वाले दावे की पोल खोल कर रख दिए। ये दावे कितने हवाई है? कितने जमीनी है? इसे अन्य देश के नागरिकों ने बेहतर ढंग से देख लिया है। जहां तक क्यूबा जैसे छोटे देश की स्वास्थ्य सुविधा की बात है तो यह अपने को समृद्धि तथा विश्व का आका मानने वाले देश अमेरिका को भी चुनौती देता है। दोनों मुल्कों की आजादी को देखें तो इनमें दादा और पोते का अंतर होगा।‌ पर कास्त्रों ने अपने ईमानदार नीतियों तथा देश के प्रति समर्पण की भावना के चलते स्वास्थ्य क्षेत्र में एक मुकाम हासिल कर लिया है। अमेरिका में जहां प्रत्येक 417 लोगों की देखभाल के लिए डॉक्टर है, वहीं क्यूबा में‌ प्रत्येक 155 लोगों की देखभाल के लिए एक चिकित्सक है। क्यूबा जैसा छोटा देश सत्तर हजार से ज्यादा डॉक्टर्स प्रशिक्षित कर रहा है। वहीं अमेरिका का आंकड़ा 64000 के करीब है। यह देश अपने यहां प्रशिक्षित डॉक्टरों को अपने देश के साथ-साथ मानव की सेवा के लिए अन्य मुल्कों में भी भेज रहा है।
अपने देश को उस अंधकार तथा गुलामी से निकलकर तरक्की की राह पर ले जाने के बावजूद कास्त्रों को कोई अहम् नहीं था। वे अपना कम तथा अपने देशवासियों के योगदान को ज्यादा अहमियत देते थे। अपने देश में आमूल चूल बदलाव लाकर भी कास्त्रों ने समाजवाद को कायम रखा। बात उस समय की है जब उनकी उम्र 65 साल की थी तब उन्होंने अपने देशवासियों को संदेश दिया कि हम सब साइकिल चलाएंगे। रातों-रात चीन से लाखों साइकिलों का आयात किया गया। और उम्र के उस पड़ाव में भी कास्त्रों ने साईकिल चलाना सीखा। उनकी साईकिल की यह सवारी मुल्क को इस कदर भायी कि देखते-देखते सारा क्यूबा मोटर कारों को छोड़कर साईकिल पर आ गया।
ऐसे में‌ फिदेल कास्त्रों के व्यक्तित्व का यह अंदाज उन्हें केवल क्यूबा तक ही महदूद नहीं करता है। बल्कि उन्हें वैश्विक जगत के प्रतीक पुरुष में प्रतिष्ठित करता है। उनका मानना भी था कि क्यूबा ही नहीं बल्कि इंसानियत ही हमारा मुल्क है। दुनिया को इंसानियत का पाठ सिखाने वाला फिदेल कास्त्रों ने इतिहास मुझे सही साबित करेगा पर भरोसा करके विदा लिया। वे मृत्यु को ही जीवन मानते थे। उन्हीं के शब्दों में-
जब कोई मरता है
अपने कृतज्ञ देश की बाहों में
संताप समाप्त होता है,
जेलों के बंधन चकनाचूर हो जाते हैं।
अंततः मृत्यु से प्रारम्भ होता है
जीवन का।।

नीरज कुमार वर्मा नीरप्रिय
किसान सर्वोदय इंटर कालेज रायठ बस्ती उ.प्र.
8400088017

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