ग़ज़ल
खींची हो इसे जिसने भी दीवार गिरा दो,
सरकार निकम्मी हो तो सरकार गिरा दो।
बीमार हो,ख़ातून हो,बूढ़ा हो या बच्चा,
गर तुम से मुक़ाबिल हो तो तलवार गिरा दो।
तुम साहब-ए-मसनद हो तुम्हें छूट है इसकी,
दहशत के लिए कोई भी मीनार गिरा दो।
मिज़ाइलें तोहफे में जो मग़रिब से मिली हैं,
उस पार से बच जायें तो इस पार गिरा दो।
गर कश्ती डूबोने पे बज़िद हो कोइ अपना,
यारी का तक़ाज़ा है कि पतवार गिरा दो।
कमजोर अब इतनी भी हवेली नहीं फिर भी,
उस पे मेरा छप्पर है अगर बार गिरा दो।
ग़ाफ़िल हैं नदीम आज भी जो क़हर-ए-ख़ुदा से,
दरवाज़े पे उन के कोइ अख़बार गिरा दो।