ग़ज़ल
ख़्वाब ही देख रहा हूं तो मैं अच्छा देखूं
काश ज़न्नत से इतर एक फ़रिश्ता देखूं
एक रिश्ते से जुड़ें लोग अगर आपस में
चाहता हूँ मैं कि रिश्ते में भरोसा देखूं
मैं बुलन्दी से गिरा गर्त में ये क़ाफी है
एक ही ज़ीस्त में अब और भला क्या देखूं
जान लूंगा मैं कि मेहनत से हुई है कसरत
इल्म तालिब में अगर ख़ूब ज़ियादा देखूं
मुज़्तरिब हो ये मेरा दिल भी बहार आने का
जब किसी शाख पे सूखा हुआ पत्ता देखूं
एक ख़्वाहिश जो हक़ीकत में बदल जाएगी
नेक इन्सान की ख़्वाहिश है मदीना देखूं
सोच आयी थी बुढ़ापे में ज़फ़र ये कैसी
मौत बे मौत मरूं या मैं वज़ीफ़ा देखूं
मौत से बढ़ के ‘अहम’ है न करिश्मा कोई
रब का मैं भी तो सुकूं से वो करिश्मा देखूं
————सुरेन्द्र सिंह ‘अहम’———–