कविता
दिन महीने साल आज भी याद है सिलसिलेवार,
हर वाकया आज भी ताज है वो चिट्टियां वो देना रुमाल।
तारीफ में तुम्हारी जो बोलो बयां कर दूं।
आंखों से दिल में आना फिर दिल में उतर जाना।
यादों में तेरी खो कर हो जाना बेख्याल।
अभी है टपक जाते आंखों से मेरे आंसू।
गर्मी की दोपहरी में दबे पांव छत पे आना।
पायल के घुंघरु के ना बजने का था ख्याल।
अमराइयों की छांव में मासूमियत से बैठकर।
खुद में खुदसे खुद को ढूंढने का वो ख्याल
चांदनी रात में वह परछाइयां पे चलना।
फिर डर के सिमट जाना
कोई देख न ले हमको आता था जब ख्याल।
मैं खुश बहुत हूं अपनी उस पाक मुहब्बत पर।
तुम अभी हो मेरे दिल में आता है जब ख़्याल।
अर्चना श्रीवास्तव
शब्द शिल्पी
बस्ती