अकबर की अम्मी का रामायण प्रेम -अजय दीक्षित

कम लोगों को मालूम होगा कि अकबर की अम्मी ने वाल्मीकि रामायण का फारसी में अनुवाद करवाया था । उस अनुवाद की कॉपी कहते हैं कि कतर की राजधानी दोहा के म्यूजियम में सुरक्षित है । इस्लामी आर्ट के इस संग्रहालय में यह अनोखी धरोहर मौजूद है । कहते हैं कि अकबर के आदेश पर बाल्मीक रामायण का अनुवाद शिष्ट फारसी में किया गया था । पहले इसका अनुवाद हिन्दी में हुआ फिर बोलचाल की फारसी में और फिर शिष्ट फारसी में । इसके लिए जो पंडित या मौलवी लगाये गये थे वह बहुत बड़े विद्वान थे, अपने-अपने क्षेत्र के । कहते हैं कि अकबर के दरबार में नियमित विभिन्न धर्मों सम्प्रदायों के जानकार इक_ा होते थे और फिर वे परस्पर विचार विमर्श करते थे । यह भी कहा जाता है कि अकबर ने सुहैल कुल नाम से जो सम्प्रदाय चलाया था उसमें सभी धर्मों और सम्प्रदायों की अच्छी-अच्छी बातें ग्रहण कर ली गई थीं । यह दूसरी बात है कि सनातन धर्म मुगल आक्रांताओं के निरन्तर प्रहार के बाद भी स्थिर रहा क्योंकि इस धर्म के अनुयायी जुल्म सहकर भी अपनी आस्था में अडिग रहे ।  अकबर ने हिन्दू धर्म स्थलों/तीर्थों की यात्रा करने वालों पर जो टैक्स लगाया था उससे भी यह आस्थावान विचलित नहीं हुये ।
अकबर की अम्मी हमीदा बानो बेगम ने फारसी जिस जिल्द में अनुवाद करवाया है, उसमें कहते हैं, चित्रकारी भी है । पहले छपाई की व्यवस्था नहीं थी । तो जो अच्छी हैंडराइटिंग में लिख सकते थे उन्हें कैलीग्राफर कहते हैं । परशियन आर्ट के जानकारों ने इस अनुवाद की प्रति को चित्रकारी से सजाया । बाद में बहुत से मुग़ल दरबारियों ने इस अनुवाद की कॉपी करके अपनी- अपनी प्रतियां बनवाईं ।
हमीदा बानो बेगम अकबर की दूसरी पत्नी थीं । उनके इंतकाल के बाद उन्हें “मरियम मकानी” की पदवी दी गई । हमीदा बानो बेगम ने जो अनुवाद करवाया था, उसकी मूल प्रति में 450 फोलियो हैं और 56 पेंटिंग हैं । कहते हैं कि यह पेंटिंग सोने के पानी से सजाई गई हैं ।
बाल्मीकि रामायण के सर्ग और श्लोकों का हू-ब-हू अनुवाद किया गया है । सबसे पहले लिखा गया है–
वह अल्लाह आलम बी– अल स्वाबी जिसका अर्थ होता है और ईश्वर जानता है सब कुछ “वा अल्लाह आलम बि-अल सवाबी” अंग्रेजी में इसका अर्थ है ” और भगवान सबसे अच्छा जानता है.
1604 में यज्ञ ग्रन्थ मुगल लाइब्रेरी में रखा गया और 1604 में उनकी मृत्यु के बाद यह दोहा के संग्रहालय में है । कहते हैं यह सुन्दर कैलीग्राफी में शुद्ध फारसी में लिखी प्रति सन् 1594 में पूरी हो पाई थी । अकबर ने अपने कार्यकाल में अनेक संस्कृत धर्म ग्रन्थों और काव्यों का अनुवाद करवाया था । इस ग्रन्थ फारसी में अनुदित ग्रन्थ में राम को तो राम ही लिखा गया है परन्तु दशरथ को ‘जशरथ’ कहा गया है । कहते हैं हमीदा बानो बेगम सीता द्वारा उठाये गए कष्टों के कारण स्वयं भी पीड़ा महसूस करती थी ।
अकबर के समय में और भी संस्कृत ग्रन्थों का अनुवाद हुआ है और हिन्दू देवी देवताओं को ‘आदम’ ‘खुदा’ अबू बसर आदि के रूप में वर्णित किया गया है ।
आज देश में जो साम्प्रदायिक माहौल में उबाल आ रहा है, उसमें ऐसे तथ्यों से कुछ उबाल कम होगा, यह उम्मीद की जानी चाहिये । [उपरोक्त विवरण टाइम्स ऑफ इण्डिया के ग्वालियर संस्करण के दिनांक 16 फरवरी, 2024 में छपी रिपोर्ट के आधार पर है ।]

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