ग़ज़ल
क्या तुम्हें मिलता है सताने से।
मानते क्यू नहीं मनाने से।।
बोल कर झूट ज़र कमाया हुआ।
यार बचता नहीं बचाने से।।
तेरे होटों की क्या करूं तारीफ़।
फूल खिलते हैं मुस्कुराने से।।
सब के सब एक जैसे हैं इन्साँ।
शिकवा करना नहीं ज़माने से।।
अपने ज़ख़्मों की ओर मत देखो।
आंख खुलती है चोट खाने से।।
सामना मुश्किलों का डट के करें।
काम चलता नहीं बहाने से।।
भूल के शिकवे आओ पहलूू में
दूरियां मिटती हैं मिटाने से।।
जो था क़िस्मत में मिल गया हर्षित।
कोई शिकवा नहीं जमाने से।।
विनोद उपाध्याय हर्षित