मैं क्या करूं कि सच का ज़माना नहीं रहा, सलीम बस्तवी अज़ीज़ी

अनुराग लक्ष्य, 3 मार्च
मुम्बई संवाददाता ।
सलीम बस्तवी अज़ीज़ी,
साहित्य और अदब ने हमेशा देश, समाज, और वक्त के हालात को अपनी कविताओं और ग़ज़लों के ज़रिए जागरूकता फैलाने में अपना अहम योगदान दिया है। जिससे समाज को एक नई दिशा और अपनी तहज़ीब और संस्कृति को बचाया जा सकता है। उसी फेहरिस्त में एक ऐसी ही सोच रखने वाली ग़ज़ल के साथ मैं हाज़िर हूं आपकी मुहब्बतों और समा अतों के हवाले,,,
1/ मैं क्या करूं कि सच का ज़माना नहीं रहा
दिल में भी मुहब्बत का खज़ाना नहीं रहा ।

2/ बच्चे भी नहीं करते अब मां बाप का अदब
तहज़ीब ओ तमद्दुन का घराना नहीं रहा ।

3/ जाड़े की धूप, गर्मी की रातों में खौफ है
मौसम भी पहले जैसा सुहाना नहीं रहा ।

4/ इक शोर है इस दौर के इस साज़ बाज़ में
दिल को जो लुभादे वोह तराना नहीं रहा ।

5/ आया यह कैसा दौर कि मस्जिद से निकल कर
मंदिर के रास्ते मेरा जाना नहीं रहा ।

6/ जब से गुलाम मोबाइल के हम , सलीम,
छत पे भी जाने का वोह बहाना नहीं रहा ।

,,,,,,,,,,, सलीम बस्तवी अज़ीज़ी,,,,,,,,,

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