अनुराग लक्ष्य, 17 फरवरी
सलीम बस्तवी अज़ीज़ी,
मुम्बई संवाददाता ।
शेर ओ सुखन की दुनिया का भी रंग बड़ा निराला है। इसकी खुशबू जब कोई इंसान ले लेता है तो उसे दुनिया की रंगीनियां फीकी नज़र आने लग जाती हैं। निर्माता, निर्देशक संजय वत्सल के साथ भी कुछ ऐसा ही हुआ और वो भी इस शय के शिकार हुए, और देखते ही देखते एक गीत रच डाला। इसी खूबसूरत गीत को आज आपसे रूबरू कराते हुए मुझे अत्यन्त ख़ुशी की अनुभूति हो रही है ।
1/ चांद तन्हा रह गया रात के बारह बजे
और सितारे सो गए सब रात के बारह बजे,,
2/ चोरी चोरी चुपके चुपके काले बादल छा गए
यूं लगा कि चांद को जैसे सताने आ गए
चांदनी फिर रो पड़ी, रात के बारह बजे,
चांद तन्हा रह गया, रात के बारह बजे,,,
3/ आ गई बरसात फिर दिल को जलाने के लिए
चांद ने समझा कि फिर मौसम सुहाने आ गए
रात भी शर्मा उठी, रात के बारह बजे,,,
4/ यादों की बगिया से भंवरे गुनगुना कर चल दिए
जितने थे जुगनू सभी सपने दिखा कर चल दिए
नींद न आई मुझे फिर रात के बारह बजे,,,,,
,,,,,,,पेशकश, सलीम बस्तवी अज़ीज़ी,,,,,,,,