ग़ज़ल
मंज़िल को जल्द पाने की शिद्दत बड़ी हुई
जब राह में कभी भी कहीं तीरग़ी हुई
भौंरे, हवा, परिन्दे समझदार हो गये
बदनाम आदमी की ही आवारगी हुई
कुछ खा़स खोजता हूं मैं शायद इसी लिए
मुझ से न ख़ास कोई कभी शाइरी हुई
महबूब के ही दिल को मुहब्बत में तोड़ना
भाती नहीं किसी को ये हरकत गिरी हुई
बुग्ज़ो हसद न पाल बुढ़ापे में ऐ बशर
तू ज़ीस्त को गुज़ार सुकूं से बची हुई
रिश्ते न टिक सकेंगे हटाए बिना इसे
फिसलन बढ़ा रही है ये काई उगी हुई
बरबादियों ने जिसको मिटा ही दिया ‘अहम’
दुनिया फ़कत उसी के लिए अजनबी हुई
————-सुरेन्द्र सिंह ‘अहम’———-