ग़ज़ल
इल्तेज़ा रब से किया करते हैं।
ख़ुश रहें आप दुआ करते हैं।
प्यार करते हैं, वफ़ा करते हैं।
फिर भी क्यों आप गिला करते हैं।
आदमी हैं तो ख़ता मुमकिन है।
आप हम सब ही ख़ता करते हैं।
हमको मंज़िल की ललक है इतनी।
बीच रस्ते न रुका करते हैं।
मुश्किलें कम तो नहीं जीवन में।
फिर भी हम हंस के जिया करते हैं।
हम न रहते हैं कभी भी तनहा।
साथ यादों के रहा करते हैं।
रूप रंगीन डगर लगती है।
साथ जब उनके चला करते हैं।
रूपेंद्र नाथ सिंह रूप