धु्रव की तरह निष्ठा हमेशा सिद्धान्त के प्रति हो- शास्त्री श्रीमदभागवत कथा

बस्ती। अपरिवर्तनीय निष्ठा का नाम ही धु्रव है। निष्ठा नहीं बदलती है तो धु्रवत्व की प्राप्ति होती है। संसार के सम्मान और अपमान में कुछ नहीं रखा है। परमात्मा के प्यार में ही सब कुछ है। व्यक्ति, संगठन और सिद्धांत यह तीन घटक हैं आदमी की निष्ठा हमेशा सिद्धान्त के प्रति होनी चाहिए। यह सद्विचार रविवार को हरैया विकासखण्ड के समौडी गांव में आयोजित श्रीमद्भागवत कथा के तीसरे दिन डॉ राम सजीवन शास्त्री जी ने भक्ति महिमा का गान करते हुए व्यासपीठ से व्यक्त किया।

भोग भक्ति में बाधक है। बिना बैराग्य के भक्ति रोती है। परमात्मा जिसे अपना मानते हैं उसे ही अपना असली स्वरूप दिखाते हैं। मनुष्य परमात्मा के साथ प्रेम नहीं करता इसलिए ईश्वर का अनुभव नहीं कर पाता श्रीकृष्ण में पागल बनोगे तो शांति मिलेगी सब साधनों का फल प्रभु प्रेम है। भगवान की लीला का कोई भी पार नहीं पाया है। इस संसार में राजा हिरणाकश्यप हुए उसने अपने को ईश्वर घोषित किया। उसके ही घर में बालक के रूप में प्रह्लाद ने जन्म लेकर अपने पिता को ईश्वर मानने से मना कर दिया। वह भगवान विष्णु की आराधना में लीन रहे। हिरणाकश्यप ने कई यातनाएं दीं। अंत में भगवान ने नरसिंह भगवान का अवतार लेकर हिरणाकश्यप का वध किया। लोगों को हिरणाकश्यप के पापों से मुक्ति दिला दी। इसी प्रकार भक्त ध्रुव ने भी भगवान की भक्ति में लीन रहकर उस प्रकाश को पा लिया, जिसे पाने के लिए लोग पूरा जीवन तपस्या में लगा देते हैं।

इस दौरान देवेंद्र नाथ मिश्र बाबू जी, धीरेन्द्र नाथ मिश्र, श्रीनाथ मिश्र, सुरेंद्र नाथ मिश्र, राम सुमति मिश्र, नन्द कुमार मिश्र, धरणीधर मिश्र, रामफूल मिश्र, विजय नारायण मिश्र, ओम नारायन पानी बाबा, ओम प्रकाश मिश्र, अनिल मिश्र, सुनील मिश्र, महेंद्र मिश्र, जगदंबा ओझा, प्रेम शंकर ओझा, विजय मिश्र, बब्बू, रवीश, वेद उत्तम, बजरंगी, गोपाल, हर्ष सहित बड़ी संख्या में श्रद्धालु उपस्थित रहे।

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