रिश्तों के आँगन हुए, अब सूने बेरंग।।

स्वार्थों की आँधी चली, बिखरे नेह-प्रसंग।
रिश्तों के आँगन हुए, अब सूने बेरंग।।
आँसू पीकर जी रहा, मन में लिए सवाल।
किसको अपनी पीर कह, जग में सब बेहाल।।
चेहरे पर मुस्कान है, मन में भरा विकार।
मीठे बोलों में छिपा, मतलब का व्यापार।।
धन-दौलत के सामने, फीके हुए विचार।
मानवता की राह में, बढ़ते अत्याचार।।
रिश्तों की दीवार पर, स्वार्थों का अधिकार।
अपनों से ही आजकल, मिलता है तिरस्कार।।
दुनिया के बाजार में, बिकता प्रेम अपार।
सच्चे मन की चाह का, मिले नहीं आधार।।
ऊँची होती जा रही, महलों की मीनार।
छोटी होती जा रही, मन की सोच-विचार।।
लोभ बढ़ा तो प्रेम का, घटने लगा प्रभाव।
मन के रिश्ते खो गए, शेष रहे बस भाव।।
सुख में साथी सैकड़ों, दुख में सूना द्वार।
वक्त बताता कौन है, अपना सच्चा यार।।
– डॉ. सत्यवान सौरभ
(डॉ. सत्यवान सौरभ, पीएचडी (राजनीति विज्ञान), एक कवि और सामाजिक विचारक है।)

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– डॉo सत्यवान सौरभ,

कवि, सामाजिक विचारक एवं स्तंभकार, आकाशवाणी एवं टीवी पेनालिस्ट,

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