जनाब,बात घुमाने की ज़रूरत क्या है,
जो आप हैं तो ज़माने की ज़रूरत क्या है।
ग़ज़ल किसी की पढ़ो,शर्त है बेख़ौफ़ पढ़ो,
ग़ज़ल है किस की,बताने की ज़रूरत क्या है।
ये रूठना,ये मानना तो है दस्तूर,मगर,
किसी को इतना मनाने की ज़रूरत क्या है।
सुला दे रेल की पटरी पे कोई अपने को,
किसी को इतना सताने की ज़रूरत क्या है।
धमाका होगा, इलेक्शन तो क़रीब आने दो,
ख़बर ये सब को बताने की ज़रूरत क्या है।
असा उठा के निकल जाये वो बीहड़ की तरफ़,
किसी को इतना दबाने की ज़रूरत क्या है।
नहीं पसंद हूँ तुम को तो ज़रा ये सोचो,
ये मेरे नाज़ उठाने की ज़रूरत क्या है।
जमीं के सारे फ़सादात की जड़ में तुम हो,
कमीन को ये बताने की ज़रूरत क्या है।
नदीम नाम ही काफ़ी है तआर्रूफ़ के लिये,
मुझे कुछ और बताने की ज़रूरत क्या है।
नदीम अब्बासी “नदीम”
गोरखपुर॥