भगदड़ की त्रासदी

– डॉ. सत्यवान सौरभ
भारत में धार्मिक आयोजनों, त्योहारों, राजनीतिक रैलियों, खेल समारोहों और रेलवे स्टेशनों पर लाखों लोगों की उपस्थिति सामान्य बात है। ऐसी विशाल भीड़ यदि वैज्ञानिक ढंग से प्रबंधित न हो, तो कुछ ही क्षणों में भयावह भगदड़ में बदल सकती है। भगदड़ केवल भीड़ के दौड़ने का परिणाम नहीं होती, बल्कि अत्यधिक भीड़-घनत्व, अनियंत्रित दबाव और निकासी व्यवस्था की विफलता से उत्पन्न होने वाली मानव-निर्मित आपदा है। अक्टूबर 2026 में कोलकाता दुर्गा पूजा के दौरान हुई भगदड़, जिसमें 19 लोगों की मृत्यु हुई, ने यह स्पष्ट कर दिया कि आधुनिक तकनीक और अनुभव होने के बावजूद भारत में भीड़ प्रबंधन की गंभीर कमियां बनी हुई हैं। इसलिए आवश्यक है कि इस समस्या को कानून-व्यवस्था के बजाय आपदा जोखिम न्यूनीकरण के दृष्टिकोण से देखा जाए।
भारत में भगदड़ की घटनाओं के पीछे सबसे बड़ा कारण क्षमता से अधिक भीड़ का एकत्र होना है। अनेक धार्मिक आयोजनों में श्रद्धालुओं की संख्या अनुमान से कहीं अधिक पहुंच जाती है, जबकि स्थल की वहन क्षमता सीमित होती है। प्रयागराज महाकुंभ 2025 की घटना ने दिखाया कि जब निर्धारित क्षमता से अधिक लोग एक साथ किसी स्थान पर पहुंचते हैं, तो भीड़ का दबाव स्वयं मृत्यु का कारण बन सकता है। विशेषज्ञों के अनुसार प्रति वर्ग मीटर छह से अधिक लोगों का घनत्व अत्यंत खतरनाक स्थिति उत्पन्न कर देता है।
दूसरा महत्वपूर्ण कारण आधारभूत संरचना की कमियां हैं। संकरे प्रवेश द्वार, अपर्याप्त निकास मार्ग, टूटे हुए बैरिकेड, अस्थायी पुल और अव्यवस्थित गलियारे लोगों की आवाजाही को बाधित करते हैं। नई दिल्ली रेलवे स्टेशन पर 2025 में हुई भगदड़ ने यह दिखाया कि सीमित प्लेटफॉर्म, भीड़भाड़ वाले फुटओवर ब्रिज और अनियोजित यात्री प्रवाह किस प्रकार दुर्घटना को जन्म देते हैं। जब हजारों लोग एक ही दिशा में आगे बढ़ने का प्रयास करते हैं, तो पीछे का दबाव आगे खड़े लोगों को गिरा देता है।
तीसरा कारण अचानक उत्पन्न होने वाली भीड़ की लहर (Crowd Surge) है। अफवाह, मौसम में अचानक बदलाव, बिजली गुल होना, किसी वीआईपी के आगमन की सूचना या किसी खतरे की आशंका कुछ ही सेकंड में लोगों को एक साथ भागने पर मजबूर कर सकती है। कोलकाता दुर्गा पूजा 2026 में भारी वर्षा और अव्यवस्थित निकासी ने ऐसी ही स्थिति पैदा की। अक्सर लोग वास्तविक खतरे से नहीं, बल्कि दूसरों को भागते देखकर स्वयं भी दौड़ पड़ते हैं।
चौथा कारण आयोजनों की कमजोर योजना और जोखिम आकलन की कमी है। कई आयोजनों में आगंतुकों की संभावित संख्या का वैज्ञानिक अनुमान नहीं लगाया जाता। प्रवेश और निकास के समय का विभाजन नहीं किया जाता तथा भीड़ के अलग-अलग प्रवाह को नियंत्रित करने की व्यवस्था नहीं होती। बेंगलुरु में 2025 के आरसीबी विजय समारोह के दौरान भीड़ नियंत्रण की अपर्याप्त तैयारी ने इस समस्या को उजागर किया।
पांचवां कारण विभिन्न एजेंसियों के बीच समन्वय की कमी है। पुलिस, प्रशासन, स्वास्थ्य विभाग, अग्निशमन सेवा, परिवहन विभाग और आयोजन समिति के बीच स्पष्ट जिम्मेदारी का अभाव प्रतिक्रिया को धीमा कर देता है। आपातकालीन चिकित्सा सहायता समय पर न पहुंच पाने से कई घायल लोगों की जान चली जाती है।
इन घटनाओं की रोकथाम के लिए सबसे पहले क्षमता-आधारित प्रवेश व्यवस्था लागू करनी होगी। बड़े धार्मिक और सार्वजनिक आयोजनों में अग्रिम पंजीकरण, डिजिटल पास, समय-आधारित स्लॉट तथा निर्धारित संख्या के बाद प्रवेश रोकने जैसी व्यवस्थाएं प्रभावी सिद्ध हो सकती हैं। इससे किसी एक समय पर भीड़ का अत्यधिक दबाव नहीं बनेगा।
दूसरा, तकनीक आधारित भीड़ निगरानी को अनिवार्य बनाया जाना चाहिए। सीसीटीवी कैमरे, कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI), ड्रोन, रियल-टाइम भीड़ घनत्व विश्लेषण और स्वचालित चेतावनी प्रणाली प्रशासन को पहले से संकेत दे सकती है कि किस स्थान पर दबाव बढ़ रहा है। स्मार्ट सेंसरों की सहायता से भीड़ के असामान्य व्यवहार की तुरंत पहचान संभव है।
तीसरा, सुरक्षित आधारभूत संरचना विकसित करना आवश्यक है। प्रवेश और निकास मार्ग अलग-अलग होने चाहिए, पर्याप्त चौड़े गलियारे बनाए जाएं, बैरिकेड मजबूत हों और स्पष्ट संकेतक लगाए जाएं। आपातकालीन निकासी गलियारों को हमेशा खाली रखा जाए ताकि आवश्यकता पड़ने पर लोग शीघ्र बाहर निकल सकें।
चौथा, आपातकालीन तैयारी को प्रत्येक बड़े आयोजन का अनिवार्य हिस्सा बनाया जाना चाहिए। आयोजन से पहले मॉक ड्रिल आयोजित की जाए, चिकित्सा दल, एंबुलेंस और प्राथमिक उपचार केंद्र तैयार रहें तथा प्रशिक्षित स्वयंसेवकों को भीड़ का मार्गदर्शन करने की जिम्मेदारी दी जाए। सार्वजनिक उद्घोषणा प्रणाली के माध्यम से समय-समय पर लोगों को शांत और व्यवस्थित रहने के निर्देश दिए जाएं।
पांचवां, राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (NDMA) के दिशा-निर्देशों का कठोर पालन सुनिश्चित किया जाना चाहिए। प्रत्येक बड़े आयोजन से पहले सुरक्षा ऑडिट कराया जाए, आयोजकों की कानूनी जवाबदेही तय की जाए और लापरवाही पाए जाने पर दंडात्मक कार्रवाई की जाए। इससे सुरक्षा को केवल औपचारिकता नहीं, बल्कि अनिवार्य जिम्मेदारी के रूप में देखा जाएगा।
इसके अतिरिक्त, जन-जागरूकता भी अत्यंत महत्वपूर्ण है। लोगों को यह बताया जाना चाहिए कि भीड़ में धक्का-मुक्की न करें, गिरने वाले व्यक्ति को उठाने में सहायता करें, अफवाहों पर विश्वास न करें और प्रशासन के निर्देशों का पालन करें। स्कूलों, कॉलेजों और सामुदायिक संस्थाओं में भीड़ सुरक्षा संबंधी प्रशिक्षण भविष्य में जोखिम कम कर सकता है।
अंततः, भारत में भगदड़ की घटनाएं यह संदेश देती हैं कि केवल पुलिस बल बढ़ाना पर्याप्त नहीं है। आवश्यकता वैज्ञानिक योजना, तकनीक आधारित निगरानी, मजबूत आधारभूत संरचना, प्रशिक्षित मानव संसाधन और संस्थागत जवाबदेही के समन्वित मॉडल की है। यदि भीड़ प्रबंधन को आपदा प्रबंधन की केंद्रीय प्राथमिकता बनाया जाए, तो धार्मिक आस्था, सांस्कृतिक उत्सव और सार्वजनिक आयोजन सुरक्षित रूप से संपन्न हो सकते हैं तथा भविष्य में ऐसी दुखद त्रासदियों को काफी हद तक रोका जा सकता है।
(डॉ. सत्यवान सौरभ, पीएचडी (राजनीति विज्ञान), एक कवि और सामाजिक विचारक है।)

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– डॉo सत्यवान सौरभ,

कवि, सामाजिक विचारक एवं स्तंभकार, आकाशवाणी एवं टीवी पेनालिस्ट,

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