सच लिखने से मत डरो, चाहे हो प्रतिकार।
झूठ भले ही जीत ले, सच माने संसार॥
शब्दों में ताकत बड़ी, शब्दों में है जान।
कलम बदल देती सदा, युग का हर अभियान॥
कागज़ पर जब चल पड़े, कलम बने तलवार।
अन्यायों के सामने, करती सीधा वार॥
झूठ महल बनकर खड़ा, सच पर पहरेदार।
कलम खोल देती सदा, सच का हर इक द्वार॥
शब्द न बिकते मोल पर, लेखन नहीं व्यापार।
कलम निभाती अंत तक, सच का ही किरदार॥
जिसके लेखन में बसा, जन-जन का दुख-दर्द।
उसके शब्दों में सदा, गूँजें जन के मर्म॥
मत समझो कमज़ोर तुम, कलमकार की धार।
शब्दों से हिलने लगें, सिंहासन कई बार॥
कलम उठे तो मिट सके, मन में भरा अज्ञान।
शब्दों से ही जागता, सोया हुआ जहान॥
झूठ भले सौ रूप धर, सच रहता निष्काम।
कलम लिखे इतिहास में, हर कर्मों के नाम॥
शब्द बने जब चेतना, बदले मन के भाव।
कलम जगाती देश में, सोए हुए स्वभाव॥
धनबल और तलवार से, जीते जग का मान।
कलम जीत ले प्रेम से, हर मानव का प्राण॥
कलमें नफ़रत बाँटती, तो बढ़ता संताप।
प्रेम लिखे तो मिट सके, मन का हर अभिशाप॥
कितने भी प्रतिबंध हों, सच न माने हार।
कलम अँधेरों में जले, बनकर नव उजियार॥
लेखक का कर्तव्य है, सच को करे बयान।
चाहे रूठे जग सभी, रखे सत्य का मान॥
शब्दों से निर्माण हो, शब्दों से संहार।
सोच-समझकर कीजिए, लेखन का व्यवहार॥
कलम उठे जनहित लिए, टूटे हर दीवार।
दबे हुए अधिकार को, देती नव आकार॥
जब तक जीवित लेखनी, जीवित रहे विचार।
कलम रहेगी तब तलक, अन्यायों की हार॥
— डॉ. प्रियंका सौरभ
(डॉ. प्रियंका सौरभ, पीएचडी (राजनीति विज्ञान), कवयित्री एवं सामाजिक चिंतक हैं।)
डॉ. प्रियंका सौरभ
पीएचडी (राजनीति विज्ञान)
कवयित्री | सामाजिक चिंतक | स्तंभकार
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(वार्ता एवं व्हाट्सएप)