अयोध्या में पितृ पक्ष का महत्व: तीर्थ पुरोहित राजेश महाराज ने दी विशेष जानकारी

 

महेन्द्र कुमार उपाध्याय
अयोध्या। पितृ पक्ष के पावन अवसर पर अयोध्या तीर्थ पुरोहित धर्मार्थ सेवा ट्रस्ट के राष्ट्रीय अध्यक्ष राजेश महाराज और तीर्थ पुरोहित समाज के अध्यक्ष ओमप्रकाश पांडे ने पितरों के तर्पण, पिंडदान और उनके आध्यात्मिक महत्व पर प्रकाश डाला। राजेश महाराज ने बताया कि सनातन संस्कृति में पितृ पक्ष पूर्वजों के प्रति सम्मान, कृतज्ञता और श्रद्धा व्यक्त करने का सबसे बड़ा पर्व है। पितृ पक्ष का महत्व और पिंडदान की परंपरा
राजेश महाराज ने कहा कि सनातन धर्म में जीवित रहते हुए माता-पिता की सेवा करना और उनके परलोक सिधारने के बाद उनका विधि-विधान से स्मरण करना प्रत्येक संतान का परम कर्तव्य है। पितृ पक्ष के दौरान पूर्वज सूक्ष्म रूप से अपने परिजनों के द्वार पर आते हैं और अपने वंशजों द्वारा दिए गए तर्पण व पिंडदान से तृप्ति प्राप्त कर आशीर्वाद देते हैं। पिंडदान कब किया जाता है। पिंडदान और श्राद्ध कर्म से जुड़ी जानकारी देते हुए उन्होंने बताया कि। समय और तिथि: आश्विन मास के कृष्ण पक्ष की प्रतिपदा से लेकर अमावस्या (जिसे सर्वपितृ अमावस्या भी कहा जाता है) तक के सोलह दिनों को पितृ पक्ष कहा जाता है। विशेष तिथि जिस तिथि को पूर्वज (माता-पिता या अन्य परिजन) की मृत्यु होती है, उसी तिथि को उनका वार्षिक श्राद्ध और पिंडदान किया जाता है।
विशेष अवसर: यदि किसी को अपने परिजनों की मृत्यु की तिथि ज्ञात न हो, तो वे आश्विन अमावस्या (सर्वपितृ अमावस्या) के दिन सभी ज्ञात-अज्ञात पितरों के नाम से पिंडदान, तर्पण और ब्राह्मण भोजन करा सकते हैं।
पूर्वजों के आशीर्वाद से मिलती है सुख-शान्ति तीर्थ पुरोहित समाज के अध्यक्ष ओमप्रकाश पांडे ने कहा कि अयोध्या जैसी धर्म नगरी में पिंडदान और तर्पण करने का विशेष महत्व है। यहां विधि-विधान से अनुष्ठान करने से पितृ दोष से मुक्ति मिलती है और परिवार में सुख, शांति, वंश वृद्धि तथा आरोग्य की प्राप्ति होती है। राजेश महाराज ने सभी सनातन धर्मावलंबियों से आह्वान किया कि वे इस पितृ पक्ष में अपने पूर्वजों का स्मरण कर उनका आशीर्वाद अवश्य प्राप्त करें।