छोड़ सकते नहीं हम दामन ए शाह ए जीलाँ, पंजतन पाक की तनवीर हैं गौस ए आज़म, इमरान गोंडवी,,,,,

अनुराग लक्ष्य, 17 सितंबर
सलीम बस्तवी अज़ीज़ी
मुम्बई संवाददाता ।
शह ए बग़दाद के आका मेरे महबूब ए सुब्हानी,
दो आलम में भी हैं आला मेरे महबूब ए सुब्हानी।
जो दिन शोले उगलते हों और रातें हों क़यामत सी,
वहाँ भी आपका साया मेरे महबूब ए सुब्हानी ।
आज इस समाचार को लिखते वक्त मैं सलीम बस्तवी अज़ीज़ी अपने उपरोक्त कलाम से इस लिए इसकी शुरूआत कर रहा हूँ। क्योंकि मैं भी सग ए बग़दाद हूँ ।
दुनिया भर के मुसलमानों के लिए यह कितनी बड़ी सआदत है कि अभी मेरे प्यारे आका सरकार ए मदीना मुस्तफा जान ए रहमत का महीना बारह रबीउल अववुल शरीफ़ गुज़रा है और तुरंत उसके बाद शहंशाह ए बग़दाद का महीना ग्यारहवीं शरीफ हमको मिला। पूरी दुनिया के मुसलमान जिस तरह बारह रबीउल अववुल का जोश ओ खरोश के साथ इस्तकबाल करते हैं उतनी ही अकीदत से ग्यारहवीं शरीफ का भी इस्तकबाल करते हैं।
आज इसी खास मौके पर शहंशाह ए बग़दाद की अकीदत और मुहब्बत में सरशार होकर उर्दू अदब के मशहूर ओ मारुफ शायर इमरान गोंडवी साहब की एक मनकबत आप तमाम पाठकों के बीच लेकर हाज़िर हो रहा हूँ ।

1 / लख्त ए दिल हज़रत ए शब्बीर हैं गौस ए आज़म,
सारे पीरों में बड़े पीर हैं गौस ए आज़म ।

2 / चाहने वालों को मुश्किल से बचा लेते हैं,
दुश्मनों के लिए शमशीर हैं गौस ए आज़म।

3/ छोड़ सकते नहीं हम दामन ए शाह ए जीलाँ ,
पंजतन पाक की तनवीर हैं गौस ए आज़म ।

4/ इसलिए लिखते हैं हम सीने पे अब्दुल क़ादिर,
हर मर्ज़ के लिए अक्सीर हैं गौस ए आज़म ।

5 / नार ए गौस लगाते हैं लगाएंगे सदा,
अहल ए ईमान की जागीर हैं गौस ए आज़म ।

6 / ऐब वोह अपने मुरीदों के छिपा लेते हैं,
चादर ए ज़ोहरा की तौक़ीर हैं गौस ए आज़म ।

7/ तू तड़पता है ऐ इमरान मदीने के लिए,
तेरे हर ख़्वाब की ताबीर हैं गौस ए आज़म ।

पेशकश,,,,,, सलीम बस्तवी अज़ीज़ी