महेन्द्र कुमार उपाध्याय
अयोध्या की यात्रा मेरे लिए केवल मंदिरों के दर्शन तक सीमित नहीं रही। रामनगरी की गलियों में घूमते हुए यहां की आस्था, परंपरा और अपनापन जिस तरह महसूस हुआ, उसने इस यात्रा को यादगार बना दिया। इन्हीं अनुभवों में हनुमानगढ़ी के बेसन के लड्डुओं की मिठास भी शामिल है।
हनुमानगढ़ी पहुंचते ही मंदिर के आसपास श्रद्धालुओं की भीड़ और प्रसाद की दुकानों से आती लड्डुओं की खुशबू ने ध्यान खींचा। बजरंगबली के दर्शन के बाद मैंने भी इन लड्डुओं का प्रसाद लिया। स्वाद में सादगी थी, लेकिन उसके पीछे जुड़ी परंपरा ने इसे मेरे लिए खास बना दिया।
स्थानीय लोगों से बातचीत में पता चला कि यहां के लड्डू पारंपरिक रूप से मोटे चने के बेसन और देसी घी से तैयार किए जाते हैं। धीमी आंच पर बेसन को भूनने की प्रक्रिया इनके स्वाद और खुशबू को अलग पहचान देती है। स्थानीय कारीगर आज भी बड़ी मात्रा में इनका निर्माण करते हैं और श्रद्धालु इन्हें प्रसाद के रूप में अपने घर ले जाते हैं।
इस यात्रा के दौरान मेरे मन में एक सवाल भी आया—अयोध्या की इस पारंपरिक मिठास को देश-दुनिया में विशिष्ट पहचान क्यों नहीं मिलनी चाहिए? यदि हनुमानगढ़ी के इन प्रसिद्ध बेसन के लड्डुओं को आधिकारिक रूप से GI टैग की मान्यता मिलती है, तो इससे न केवल इसकी पारंपरिक पहचान और कारीगरों को संरक्षण मिल सकता है, बल्कि अयोध्या की स्थानीय खाद्य संस्कृति को भी वैश्विक पहचान मिल सकती है।
GI टैग किसी खास भौगोलिक क्षेत्र से जुड़े विशिष्ट उत्पाद की पहचान और संरक्षण से जुड़ा होता है। ऐसे में अयोध्या की धार्मिक और सांस्कृतिक विरासत से गहराई से जुड़े इस प्रसाद के लिए GI मान्यता की पहल निश्चित रूप से विचारणीय है।
हनुमानगढ़ी में बजरंगबली को लड्डू का भोग लगाने की परंपरा ने इस प्रसाद को श्रद्धालुओं की आस्था से जोड़ दिया है। अयोध्या से लौटते समय मेरे साथ मंदिरों की तस्वीरें और यादें तो थीं हीं, लेकिन हनुमानगढ़ी के लड्डुओं की वह मिठास भी थी, जिसने इस यात्रा को कुछ और खास बना दिया।