ग़ज़ल
ख़्वाब आँखों में पल गया कोई
जिस्म से जाँ में ढल गया कोई
दिल को अब भी यकीं नहीं आता
ऐसे कैसे बदल गया कोई
जिस्म हैरत से रह गया तकता
रूह छूकर निकल गया कोई
झाँककर आपकी निगाहों में
गिरते-गिरते सम्भल गया कोई
इश्क़ की आँच में वो शिद्दत थी
मोम जैसे पिघल गया कोई
कोई शोलों में बेअसर था तो
बर्फ़ छूकर भी जल गया कोई
-डॉ कविता”किरण”✍️