अनुराग लक्ष्य, 12 जुलाई
सलीम बस्तवी अज़ीज़ी
मुम्बई संवाददाता ।
मुंबई की सरजमीन पर आज साहिल प्रतापगढ़ी धीरे धीरे अपनी मंज़िल की तरफ ग़ामज़न हो रहे हैं और अपने मगरी कलाम से सामईन को अपनी तरफ खींच भी रहे हैं, आइए आज उन्हीं की एक ग़ज़ल से लुत्फ अन्दोज़ होते हैं।
*१* – इस दिल में हैं तूफान उठे किस कदर के देख,
यानी कि कलेजे में कभी तू उतर के देख ।
*२* – मेरी निगाह मस्त में तू डूब जायेगा,
कुछ देर निगाहों में मेरी बस ठहर के देख ।
*३* – जो चाहता है मंज़िले मक़सूदे मोहब्बत,
तो इश्क़ में आगे कभी हद से गुजर के देख ।
*४* – फिर खौफ किसी और का न होगा यक़ीनन,
अल्लाह के गज़ब से ज़रा कुछ तो डर के देख ।
*५* – इल्ज़ाम आईने पे न तू बारहा लगा,
ओछी नज़र हुई है क्या तेरी नज़र के देख ।
*६* – उड़ना नहीं छोड़ूॅंगा मेरा हौसला है ये,
चाहे तो कैंचियों से मेरे पर कतर के देख ।
*७* – अपनों से ही धोखाधड़ी करते हैं ऐ *साहिल*,
ये लोग किस तरह के हैं तेरे शहर के देख ।
पेशकश,,,,, सलीम बस्तवी अज़ीज़ी,,,