ग़ज़ल
गंडे ताबीज़ से उक्ता के चला आया हूँ,
शेख़ साहब को मैं बहका के चला आया हूँ।
तुम ने इमान का सौदा किया जिस की ख़ातिर,
उसी कुर्सी को मैं ठुकरा के चला आया हूँ।
इस क़दर भीड़ थी महफ़िल में तेरे,न पूछो,
इसलिये वाँ से मैं घबरा के चला आया हूँ।
घर में चूल्हा जले या लाऊँ खिलौना उसका,
फिर से नाती को मैं फुसला के चला आया हूँ।
मुझ को हल्के बहुत ले रहा था मेरा हरीफ़,
उस की जागीर को दहला के चला आया हूँ।
जिस मुअम्मे में थे उलझे हुये सब दानिश्वर,
उस को चुटकी में मैं सुलझा के चला आया हूँ।
दुश्मनी में भी मैं मेआर का क़ायल हूँ नदीम,
इसलिए बस उसे समझा के चला आया हूँ।
नदीम अब्बासी “नदीम”
गोरखपुर॥