प्रथम दिवस – माँ शैलपुत्री

काव्य : “प्रथम दिवस – माँ शैलपुत्री”

 

चैत्र की नव अरुणिमा में, भोर नई मुस्काई है,

शक्ति का प्रथम स्वरूप धरा पर फिर आई है।

पर्वत-सी अडिग जिनकी, महिमा अपार है,

माँ शैलपुत्री का आज प्रथम श्रृंगार है।

वृषभ पर विराजित, कर में त्रिशूल सुहाता,

कमल-सा कोमल मुख, जग को पथ दिखलाता।

हिमालय की पुत्री, धैर्य की पहचान,

उनके चरणों में बसता सारा जहान।

सादगी में शक्ति का अद्भुत यह विस्तार,

हर कण में भर देती जीवन का संचार।

जो झुके श्रद्धा से, उसे आशीष मिलता,

हर संकट का बंधन पल में ही खिलता।

नव दुर्गा की यह पहली ज्योति निराली,

भक्ति से भर दे मन, हर पीड़ा टाली।

अज्ञान के अंधेरों को दूर भगाती,

आस्था की लौ बन हृदय में जगमगाती।

हे माँ शैलपुत्री! कृपा की दृष्टि रखना,

हर पथिक के जीवन में उजियारा भरना।

पहले दिन का यह पावन संदेश यही,

शक्ति और विश्वास से बढ़े जीवन सभी।

 

राजलक्ष्मी श्रीवास्तव

जगदलपुर राजिम

छत्तीसगढ़