वो इतनी दूर था मुझ को पुकारता कैसे,
मैं ख़ुद नश्शे में था उसको संभालता कैसे।
बिछी थी राहों में फूलों की क्यारियाँ मेरे,
मैं अपने आप को उस पे गुज़ारता कैसे।
मेरे अज़ीज़ ही मुझको डुबो के आये थे,
अब इसके बाद मैं ख़ुद को उभारता कैसे।
ज़माने भर का जब एहसान था मेरे सर पर,
फिर एक मुश्त में उनको उतारता कैसे।
किसी भी रुख़ पे गिरे जीत उसकी होनी थी,
ये जानते हुए सिक्का उछालता कैसे।
मैं शक के दायरे में आ गया हूँ बच्चों के,
ये जानते हुए पत्थर उबालता कैसे।
वहीं नदीम भी रहते हैं एक हुजरे में,
ये जानता तो मैं बस्ती उजाड़ता कैसे।
नदीम अब्बासी ‘नदीम’
गोरखपुर॥