लखनऊ, । भारत और नेपाल के सदियों पुराने सांस्कृतिक, आध्यात्मिक और सामाजिक संबंधों को नई ऊर्जा प्रदान करता भारत-नेपाल मैत्री महोत्सव 2026 इन दिनों जनमानस को लोक संस्कृति के रंगों से सराबोर कर रहा है। 16 फरवरी से प्रारंभ हुआ यह महोत्सव अब अपने आधे पड़ाव तक पहुंच चुका है और दोनों देशों के कलाकारों की अनूठी प्रस्तुतियों ने दर्शकों को मंत्रमुग्ध कर दिया है। झगड़ जनजाति लोक नृत्य, कुमारी नृत्य, फरुवाही लोक नृत्य और बधावा लोक नृत्य की मनमोहक छटा ने भारत-नेपाल की साझा विरासत को नई ऊंचाई दी है।उत्तर प्रदेश के पर्यटन एवं संस्कृति मंत्री जयवीर सिंह ने बताया कि यह महोत्सव दोनों देशों के संबंधों को सुदृढ़ करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण पहल है। उन्होंने कहा कि भारत और नेपाल के रिश्ते केवल कूटनीतिक नहीं, बल्कि सांस्कृतिक, धार्मिक और भावनात्मक आधार पर सदियों से जुड़े हैं। यह आयोजन पर्यटन और सांस्कृतिक आदान-प्रदान को नया आयाम देगा और आपसी विश्वास को और मजबूत करेगा।महोत्सव प्रदेश के पूर्वांचल और तराई के आठ जिलों—कुशीनगर, सिद्धार्थनगर, महाराजगंज, बलरामपुर, श्रावस्ती, बहराइच, लखीमपुर खीरी और पीलीभीत—में आयोजित किया जा रहा है। यहां ‘एक जनपद, एक उत्पाद (ओडीओपी)’ प्रदर्शनी भी आकर्षण का केंद्र बनी हुई है, जहां स्थानीय उत्पादों और शिल्प को बढ़ावा दिया जा रहा है।28 फरवरी तक चलने वाले इस महोत्सव में स्काउट एंड गाइड के बच्चों द्वारा योग प्रदर्शन, भारत-नेपाल मैत्री विषय पर चित्रकला और रंगोली जैसी रचनात्मक गतिविधियां आपसी मित्रता का सशक्त संदेश दे रही हैं। नेपाल से आए कलाकारों की प्रस्तुतियों ने इस मैत्री को केवल शब्दों तक सीमित नहीं रखा, बल्कि उसे आत्मीयता के जीवंत उत्सव में बदल दिया है।मंत्री जयवीर सिंह ने कहा कि यह महोत्सव युवाओं को अपनी सांस्कृतिक जड़ों से जुड़ने का संदेश दे रहा है। डिजिटल युग में जी रही नई पीढ़ी जब परंपरा के रंगों को अपनाती है, तब पूर्वांचल और तराई की धरती पर भारत-नेपाल मैत्री और भी प्रखर एवं अर्थपूर्ण स्वरूप में सामने आती है। धोबिया लोकनृत्य और नुक्कड़ नाटकों की प्रभावशाली प्रस्तुतियों ने दोनों देशों के ‘रोटी-बेटी’ के आत्मीय संबंध को भावनात्मक गहराई से मंचित किया, जिससे दर्शक भाव-विभोर हो उठे और यह संदेश गया कि यह पारंपरिक मित्रता आगे भी इसी उत्साह और सम्मान के साथ मनाई जाती रहेगी।