महेन्द्र कुमार उपाध्याय
अयोध्या। धार्मिक नगरी अयोध्या में आयोजित एक विशेष प्रवचन कार्यक्रम के दौरान सदगुरु भगवान ने सुंदर कांड के गूढ़ आध्यात्मिक और सामाजिक अर्थों पर प्रकाश डाला। उन्होंने श्रद्धालुओं को संबोधित करते हुए कहा कि सुंदर कांड रामकथा का मात्र एक अध्याय नहीं है, बल्कि यह त्याग, सेवा और धर्म के प्रति अटूट निष्ठा का एक अनुपम प्रतीक है। भावों की सुंदरता ही सुंदर कांड का सार प्रवचन के दौरान सदगुरु भगवान ने उपस्थित जनसमूह से संवाद करते हुए एक मार्मिक प्रश्न पूछा— “क्या आप जानते हैं कि इसे सुंदर कांड क्यों कहा जाता है?” उन्होंने स्वयं उत्तर देते हुए समझाया कि इसकी सुंदरता केवल छंदों या शब्दों में नहीं, बल्कि इसके उच्च भावों में समाहित है। उन्होंने हनुमान जी के ‘सखा-भाव’ का उदाहरण देते हुए कहा कि सच्ची मित्रता वही है जो संकट के समय ढाल बनकर खड़ी हो और बिना किसी स्वार्थ के धर्म के मार्ग को अपना लक्ष्य बना ले।
धर्म कार्यकर्ताओं को सेवा और समर्पण का संदेश सदगुरु भगवान ने विशेष रूप से धर्म संगठनों से जुड़े कार्यकर्ताओं को प्रेरित करते हुए कहा कि सेवा कार्यों में ‘लाभ-हानि’ का विचार नहीं होना चाहिए। उन्होंने स्पष्ट किया । जब सेवा को गणना से जोड़ा जाता है, तो वह बोझ बन जाती है, लेकिन जब वही सेवा श्रद्धा से की जाती है, तो वह साधना बन जाती है। संगठन का कार्य पद के लिए नहीं, बल्कि समाज और संस्कृति के उत्थान के लिए होना चाहिए।जटायु और सम्पाती के उदाहरण से भावुक हुए श्रद्धालु
प्रवचन के दूसरे चरण में उन्होंने जटायु के बलिदान और सम्पाती के धैर्य की चर्चा की। उन्होंने कहा कि जटायु ने अधर्म के विरुद्ध संघर्ष में प्राण न्योछावर कर दिए, वहीं सम्पाती ने अपने कष्टों को तप में बदलकर श्रीराम के कार्य में मार्गदर्शक की भूमिका निभाई। सदगुरु ने संदेश दिया कि धर्म के मार्ग पर किया गया कोई भी त्याग व्यर्थ नहीं जाता—चाहे वह जटायु की तरह बलिदान हो या सम्पाती की तरह सही दिशा दिखाना।
इनकी रही गरिमामयी उपस्थिति
इस पावन अवसर पर धर्म और अध्यात्म जगत की कई प्रमुख विभूतियाँ उपस्थित रहीं, जिनमें मुख्य रूप से श्रेष्ठाचार्य आचार्य सुदर्शन राष्ट्रीय महासचिव: धर्मानंद पांडे एवं सुक्रीत मीडिया प्रभारी आचार्य विश्वामित्र वरिष्ठ संत अवधुत अखिलेश्वरवानंद, पूर्ण कालिक आचार्य दिव्यानंद, आचार्य भागीरथी, आचार्य अटल और अवधेश महाराज। कार्यक्रम के अंत में सदगुरु भगवान ने आह्वान किया कि आज के आधुनिक समाज में सुंदर कांड के संदेश—मैत्री, त्याग और निस्वार्थ सेवा—को आत्मसात करना अत्यंत आवश्यक है, क्योंकि यही भाव जीवन को वास्तव में ‘सुंदर’ बनाते हैं।