( औलाद-ए-गौसे आजम )
पेशावर की सरजमीं पर एक रूहानी शख्सियत मोहतरम शाह साहब,,,,
अनुराग लक्ष्य, 25 जनवरी
सलीम बस्तवी अज़ीज़ी
मुम्बई संवाददाता ।
शह ए बगदाद के आक़ा मेरे महबूब ए सुब्हानी,
दो आलम में भी हैं आला मेरे महबूब ए सुब्हानी,
तेरे बिखरे करामात का किनारा मिल नहीं सकता,
ज़मीं बोली फलक गया मेरे महबूब ए सुब्हानी ।।
यह नूरानी चेहरा और रूहानी जलाल गवाही दे रहा है कि आज भी अल्लाह के नेक बंदों की बरकतें जारी हैं। पाकिस्तान के शहर पेशावर की सरजमीं को यह फख्र हासिल है कि यहाँ मोहतरम शाह साहब जैसी शख्सियत मौजूद हैं, जिन्हें हुजूर सय्यदना गौस-ए-आजम (रज़ि.) की पाकीज़ा नस्ल और औलाद में से माना जाता है।
जमाल-ए-मुस्तफा और निस्बत-ए-गौसिया:
कहा जाता है कि वली की एक नजर मुर्दा दिलों को जिंदा कर देती है। मोहतरम शाह साहब के चेहरे की यह सादगी और सफेद रिश-ए-मुबारक (दाढ़ी) उस खानदानी शराफत और रूहानियत की निशानी है जो बगदाद शरीफ से चली और आज पेशावर की वादियों में खुशबू फैला रही है।
अकीदत के दो बोल:
“वही तो है जो दिलों की बिगड़ी बना देते हैं,
निगाह-ए-मर्दे-मोमिन से तकदीर बदल देते हैं।”
मैं सलीम बस्तवी अज़ीज़ी, अपने रब से दुआ करता हूँ कि मौला! पेशावर की इस नूरानी शख्सियत, मोहतरम शाह साहब का साया अकीदतमंदों पर सलामत रखे। इनके वसीले से हमें हुजूर गौसे पाक (रज़ि.) की सच्ची गुलामी और अल्लाह की मोहब्बत नसीब फरमाए।
अमीन या रब्बल आल मीन।