बचपन की सुनहरी यादें
बचपन की वो मीठी यादें, सबसे बड़ी निराली हैं,
घर-आँगन की रौनक थी मैं, सबकी बड़ी वो लाड़ली हैं।
मन्नतों के बाद आई थी, माँ-बाबा की गोदी में,
पाँच साल का इंतज़ार था, खुशियाँ छाई टोली में।
कोई गुड़िया कहता मुझको, कोई ज्योति पुकारता,
बड़े पापा का दिया नाम ही, माँ के मन को भाता ।
आँगन में वो बड़ा सा झूला, सबकी जान हुआ करता,
भाई-बहन संग शोर मचाना, दिल खुशियों से भरता।
पटना वाली वॉक गाड़ी ने, चलना हमें सिखाया था,
मुझसे ही हर छोटी चीज़ का, घर में श्रीगणेश आया था।
ठेलागाड़ी की वो मस्ती, और भाई-बहन का साथ था,
“बासी आँगनवा बूले ललनवा”, होठों पर ये बात थी ।
दो सीटों की गाड़ी अपनी, पटना-उखड़ा जाती थी,
नई सवारी रोज़ बिठाकर, खेल हमें सिखाती थी।
फूफाजी की वो चाभी गुड़िया, पटरी पर जो चलती थी,
आज उन्हीं की यादें बनकर, आँखों में वो पलती हैं।
ज्योती वर्णवाल
नवादा (बिहार)