साल 2024 की बात है। मैं भगवान श्रीकृष्ण की बहुत बड़ी भक्त हूं। वर्षों से मेरा मन वृंदावन जाने के लिए तरस रहा था। हर बार जब भी जाने का निश्चय करती, कुछ न कुछ ऐसा हो जाता कि यात्रा टल जाती। लोग कहते – “अभी तुम्हारी भक्ति सच्ची नहीं है, इसलिए भगवान का बुलावा नहीं आया।” मैं मन ही मन मान लेती। वैसे भी, मैं कौन-सी बड़ी भक्त थी? बस ठाकुर जी से प्रेम करती थी। यही मेरा सबसे बड़ा भाव था।
इस साल, 2024 में, मैंने फिर निश्चय किया – “अबकी बार वृंदावन जरूर जाऊंगी।” लेकिन किस्मत को कुछ और ही मंजूर था। वृंदावन की बजाय मैं अपनी बहन के पास पुणे चली गई। वहां सबने घूमने का प्लान बनाया। अचानक सबकी सहमति बनी – “चलो इस्कॉन चलते हैं।”
मेरे मन में एक संकोच था। इस्कॉन मुझे पसंद है, लेकिन मेरी इच्छा थी कि पहले वृंदावन के दर्शन करूं, फिर इस्कॉन जाऊं। पर परिस्थिति कुछ ऐसी बनी कि हम सीधे इस्कॉन चले गए।
मार्च 2024 की वह दोपहर आज भी मेरी स्मृतियों में जिंदा है। जैसे ही इस्कॉन का द्वार दिखा, मेरा मन बेचैन हो उठा। पता नहीं क्यों, पर ऐसा लग रहा था जैसे मुझे किसी ने पुकारा हो। मैंने कार में ही चप्पल उतार दी और तेज़ी से मंदिर की ओर बढ़ने लगी। मुझे बच्चों का, किसी का भी ध्यान नहीं रहा। ऐसा लग रहा था जैसे मेरा शरीर, मेरी आत्मा किसी अदृश्य शक्ति के खिंचाव में श्रीकृष्ण और राधा रानी के चरणों की ओर भागी जा रही हो।
रास्ते में कई लोग थाल, प्रसाद, फूल देने लगे। किसी ने कहा – “माताजी प्रसाद ले लीजिए।” किसी ने कहा – “कमल का फूल ले लीजिए।” पर मैं किसी से कुछ नहीं ले पाई। उस क्षण मुझे किसी चीज़ की जरूरत ही नहीं थी। बस मन में एक ही भाव था – “मुझे भगवान के दर्शन करने हैं।”
जैसे ही मैंने मंदिर में प्रवेश किया, मेरी निगाह सबसे पहले श्रीकृष्ण पर पड़ी। उनका रूप… उनका सौंदर्य… उनकी आँखें… उनके पीतांबर… उनके चरण… सब मुझे मंत्रमुग्ध कर रहे थे। पर तभी, मेरे भीतर एक आवाज़ सी गूंजी –
“अरे पगली! तू मुझे क्यों देख रही है? तू राधा रानी की भक्ति कर। मैं तो खुद उनके चरणों का दास हूं।”
मेरी दृष्टि तुरंत राधा रानी की ओर उठी। और फिर… मैं स्तब्ध रह गई। उनकी आँखों में जो ममता थी, जो करुणा थी, वह शब्दों में बयां नहीं कर सकती। मेरे नेत्रों से अश्रुओं की धारा फूट पड़ी। आँसू रुकने का नाम ही नहीं ले रहे थे। भीड़ थी, लोग इधर-उधर जा रहे थे, पर मुझे कुछ दिख नहीं रहा था। उस क्षण केवल मैं थी, और राधा रानी।
मैं इतनी देर तक रोई कि समय का होश ही नहीं रहा। अचानक मैंने देखा, मंदिर के अंदर प्रांगण में एक 14-15 साल की सुंदर सी बच्ची खड़ी थी। वह अपनी मम्मी-पापा के साथ आई थी। शायद कोई विशेष पूजा के लिए। वह मुझे ध्यान से देख रही थी। फिर वह मेरे पास आई और बड़े प्यार से बोली –
“माताजी, आप क्यों रो रही हो?”
मैंने सिर हिलाया – “कुछ नहीं।”
वह फिर मुस्कुराई और बोली –
“क्या आप अंदर आना चाहोगी दर्शन करने के लिए?”
मैंने कहा – “नहीं, यहीं से ठीक है।”
वह कुछ पल मुझे देखती रही और फिर चली गई। मैं फिर से राधा रानी में खो गई। आँसू अब भी बह रहे थे। लेकिन तभी, वही बच्ची फिर लौटी। इस बार उसने मेरे सिर पर हाथ फेरा, प्यार से सहलाया और पूछा –
“माताजी, आपको क्या चाहिए? कुछ चाहिए?”
मैंने कहा – “नहीं, मुझे कुछ नहीं चाहिए।”
फिर उसने मुस्कुराते हुए कहा –
“तो फिर आप क्यों रो रही हो?”
मैंने धीमे से कहा –
“पता नहीं… बस राधा रानी को देखकर रोने लगी।”
उसने फिर से मेरे सिर पर हाथ फेरा, मेरी पीठ सहलाई, और मुझे गले से लगा लिया। फिर बोली –
“अब मत रोइए माताजी। अब आपके बुरे दिन खत्म हो गए। अच्छे दिन आने वाले हैं। सब अच्छा होगा। जैसे आप चाहती हैं, वैसा ही होगा।”
उसकी बातें सुनकर मैं भाव-विभोर हो गई। मैंने उसके चरण छूने चाहे। जब मैंने उसके चरण पकड़े, पता नहीं क्यों, मुझे लगा कि ये कोई साधारण पैर नहीं हैं। मैंने उसे देखा, फिर राधा रानी की मूर्ति को देखा। और उस क्षण… मुझे ऐसा लगा कि राधा रानी खुद मेरे सामने खड़ी हैं।
उस बच्ची ने मुझे एक फूल दिया और कहा –
“चिंता मत करो। सब ठीक हो जाएगा।”
मैंने फूल लिया, उसे गले लगाया और वह चली गई। उसके जाते ही मुझे ऐसा लगा जैसे मेरा सारा बोझ उतर गया हो। मेरे आँसू थम गए। मन इतना हल्का, इतना शांत हो गया कि मैं शब्दों में बयां नहीं कर सकती।
मैंने इधर-उधर देखा, वह बच्ची कहीं नहीं थी। भीड़ में गायब। मैंने बहुत ढूँढ़ा… पर वह नहीं मिली।
उस दिन के बाद से मेरा जीवन बदल गया। मेरे भीतर एक नया सवेरा हुआ। पहले मैं केवल श्रीकृष्ण का नाम लेती थी। अब राधा रानी मेरे जीवन का केंद्र बन गईं। शायद यही संदेश मुझे मिला –
“कृष्ण तक पहुँचना है, तो राधा से प्रेम करो।”
आज भी जब मैं उस अनुभव को याद करती हूं, तो लगता है कि वह बच्ची कोई और नहीं, स्वयं श्रीमती राधा रानी थीं, जिन्होंने मेरे जीवन का अंधकार मिटाकर मेरे मन में प्रेम, विश्वास और आशा का दीपक जला दिया।
यह था मेरा पुणे इस्कॉन का अनुभव… एक ऐसा अनुभव जिसे मैं जीवनभर नहीं भूल पाऊंगी।
राधे राधे
नेहा वार्ष्णेय
दुर्ग छत्तीसगढ़