अनुराग लक्ष्य, 20 अगस्त
सलीम बस्तवी अज़ीज़ी
मुम्बई संवाददाता ।
मेरे खयाल में यह बात सभी साहित्यकार और अदब नवाज़ बखूबी जानते होंगे कि उत्तर प्रदेश साहित्य और अदब के लिए हमेशा पूरे मुल्क में जाना और पहचान जाता रहा है। उसी उत्तर प्रदेश के ज़िला गोण्डा के तुलसीपुर का एक साहित्यिक हीरा है जो साहित्य की दुनिया में कन्हैया लाल मधुर के नाम से जाना और पहचाना जाता है। आपको बताते चलें कि कन्हैया लाल मधुर अपने कर्डप्रिय गीतों और ग़ज़लों के लिए हमेशा कवि सम्मेलन और मुशायरे में शामिल होते हुए अपनी भरपूर उपस्थित दर्ज कराते आए हैं। मैं सलीम बस्तवी अज़ीज़ी आज उनकी डायरी से एक खूबसूरत गीत आप समस्त पाठकों तक पहुंचा रहा हूं ।
मुखड़ा,,,तेरा नाम रटते रटते बेनाम हो ना जाऊं,
तेरी गली भटकते बदनाम हो ना जाऊं ।
अंतरा 1,,,,,तू नदी की धार चंचल, मैं हूं तेरा किनारा ।
तू सुबह की रोशनी है, मैं शाम का नजारा।।
तेरे शहर में हम दम गुमनाम हो ना जाऊं ।।
तेरा …….
अंतरा,2,,,,तू है इक काली सुमन की, मैं हूं भ्रमर बेचारा ।
तू है महल की शोभा मैं घूमता आवारा ।।
मुझे डर ये लग रहा है सरेआम हो ना जाऊं ।।
तेरा …..
अंतरा,3,,,तेरी यादों की वो खुशबू पागल बना रही है,
ओ मीठी मीठी बातें मुझे याद आ रहीं हैं।।
नाकामें मोहब्बत का पैगाम हो ना जाऊं ।।
तेरा ………
अंतरा,4,,,सपनों में मुझको दिखती बेजार हो बिलखती,
मेरे दिल की धड़कनों के एहसास में सिसकती ।।
तेरी मधुर सुबह का मैं शाम हो ना जाऊं ।।
तेरा …….