एक खूबसूरत शख्सियत मुंबई की सरज़मीन पर आई और अपनी खुशबू बिखेर कर चली गई, अदबी नशिस्त की सुरमई शाम का हुआ आयोजन,,,,,

अनुराग लक्ष्य, 17 अगस्त
सलीम बस्तवी अज़ीज़ी
मुम्बई संवाददाता ।
मेरे बुजुर्गों के सर की पगड़ी जो हो सके तो बचाए रखना,
दिलों में उनकी नसीहतों के जो फूल हैं वोह खिलाए रखना ।
यह वक्त ऐसा ही आ गया है कि फिक्र करने की है ज़रूरत,
किसी भी सूरत में अपने घर को मुहब्बतों से सजाए रखना ।।
मैं सलीम बस्तवी अज़ीज़ी आज अपने कलाम से इसलिए इस समाचार को लिख रहा हूँ, जो इसके सच्चे हकदार भी हैं और मेरी यह उपरोक्त पंक्तियाँ उनके क़दमों में मेरे श्रद्धा के फूल भी हैं।
जी हाँ, हम बात कर रहे हैं मशहूर ओ मारूफ शाइरा पूनम विश्वकर्मा के पिता डॉटर राम जीत विश्वकर्मा जी के मुंबई आगमन पर उनके सम्मान में आयोजित अदबी नशिस्त की , जो एक सुरमई शाम में तब्दील हो गई। पूनम विश्वकर्मा के आवास कांदिवली आविष्कार बिल्डिंग में आयोजित इस अदबी नशिस्त में मुंबई की मायनाज़ हस्तियों ने शिरकत कर के इसे यादगार बना दिया, सबसे पहले शायर नबील सैय्यद साहब का कलाम,
,,, पहला सा आशिकी का ज़माना नहीं रहा,
लैला भी वोह नहीं वोह दीवाना नहीं रहा,,, सुनाकर नशिस्त को नई रंगत दी।
इसी तरह मुंबई के महबूब शायर माधव नूर साहब का कलाम भी ख़ूब पसंद किया गया, इस शेर के साथ कि,
,,,फ़लक पे चाँद जो निकले हसीन रात बने,
वोह छत पे आएं तो ऐ नूर कोई बात बने,,,,
इसी क्रम मे शाइरा पूनम विश्वकर्मा ने अपनी खूबसूरत शायरी का मुज़ाहरा कुछ इस अंदाज़ में बयां करती हुई नजर आईं जिसे बेहद सराहा गया, उनका कलाम,
,,, बेटियाँ जैसे हैं जंगल में उगी घास की तरह,
इनको पाने के लिए व्रत न उपवास है कोई ।
यह वोह सरिताएं हैं बहती हैं जो औरों के लिए,
सुख जाती हैं लिए दिल में दबी प्यास की तरह ।।
इसी फेहरिस्त में इंशाद के रूह ए रवाँ जनाब नवीन जोशी नवा साहब का कलाम भी ख़ूब सराहा गया इन पंक्तियों के साथ, कि,
,,, दिल की खिड़की से मुझे प्यार के धागे में पिरोकर,
दामन ए ख़्वाब में मुझको भी कहीं बुन लेना ।
बात जब आ न सके मेरी ज़बां के दर तक,
झांक कर आंखों की खिड़की से उसे सुन लेना ।।
और, आखिर में शायर एवम् गीतकार सलीम बस्तवी अज़ीज़ी का कलाम,
,,, जिसका बेटा लड़ते लड़ते मुल्क पे हो जाता है शहीद,
बरसों उसके ग़म का सहना अच्छा लगता है ।
माना शहंशाहों के जैसा मेरे तन पे है यह लेबास,
पर, यह जो है आपने पहना अच्छा लगता है ।। सुनाकर सामाजिक विसंगतियों पर करारा प्रहार किया, जिसे उपस्थित श्रोताओं ने बेहद सराहा।
और अंत में इस ख़ास अवसर पर सभी अहबाब और अपने चाहने वालों का शुक्रिया अदा करते हुए डॉक्टर राम जीत विश्वकर्मा ने कहा कि आज की यह मुहब्बत से लबरेज़ शाम मुझे हमेशा याद रहेगी। जो प्यार स्नेह और इज्ज़त आप सभी हज़रात ने मुझे बख्शी है उसको मैं हमेशा सहेज कर रखूंगा। जो मेरे यादों में सबसे बेहतरीन यादों में एक होगी।
इस खास अदबी नशिस्त को कामयाब बनाने में देवमणि पांडेय जी, नवीन चतुर्वेदी जी, हरगोविंद विश्वकर्मा सहित परिवार के सभी सदस्यों का सहयोग सराहनीय रहा।