दिखाइ देते नही यार पुराने वाले,
कहां छुपे हैं वो रूठों को मनाने वाले ।
नहीं मिलेगे कहीं , आप हजारों ढूंढों,
किसी की याद में अश्को को बहाने वाले ।
तबाह कर के मुझे खुश न हो, ये सोचो ज़रा ,
नज़र से तुम को गिरा देगे ज़माने वाले ।
क़सीदा उनका पंढे वो भी झुकाए सर को ,
समझते क्या हैं हमे ऊंचे घराने वाले ।
कभी भी राहों मे दिखलाई नहीं देते हैं ,
मेरे ख़तो को किताबों में छुपाने वाले ।
क़सूरवार क्यों ठहराउं किसी ग़ैर को मैं ,
सभी थे अपने मेरे घर को जलाने वाले ।
नदीम आज भी मैं ढूंढ रहा हूँ उनको ,
कहां गये वो मेरे नाज़ उठाने वाले ।
नदीम अब्बासी “नदीम”
गोरखपुर॥