पावन गायत्री कथा

ओ३म् 🪷🪷
*पावन गायत्री कथा*
ओ३म् प्रेष्ठे वो अतिथि स्तुषे मित्रमिव प्रियम्। अग्ने रथं न वेद्यम्।।
सामवेद मंत्र-५
🍁 *मंत्र का पदार्थ*🍁
हे मनुष्यो! *मित्रमिव प्रियम्* = मित्र के समान हितसाधक🌸 *प्रेष्ठम्*=अतिप्रिय🌸 *अतिथिम्* = निरंतर व्यापक 🌸 *वेद्यम्*= जानने योग्य अथवा हृदयरूपी वेदी में ध्यान करने योग्य🌸 *रथं न*= रथ के समान सबके आधार और वाहक= पहुंचाने वाले 🌸 *अग्ने:* = प्रकाशमान परमात्मा की🌸 *स्तुषे*= तू स्तुति कर।
🌽 *मंत्र की व्याख्या*🌽
मंत्र के भाव को समझाने के लिए उसे दो भागों में विभक्त किया है!
*प्रथम भाग का आशय*
मंत्र का पहला भाग जिसे विधिवाक्य कहते हैं।मानव जीवन का मुख्य लक्ष्य है–उस प्रभू की स्तुति का गीत गाना!
*दूसरे भाग में विशेषण*
मंत्र के दूसरे भाग में छ:[६ ] विशेषणों द्वारा उस प्रभू स्वरुप का दिग्दर्शन कराया गया है।
*[१]* वह ईश्वर ही श्रेष्ठ मित्र के समान हितसाधक तथा प्रिय है।
*[२]* वह सबसे अधिक प्रेम करने योग्य है।
*[३]* वह निरंतर व्यापक है।
*[४]* वही जानने योग्य और हृदय रुपी वेदी में ध्यान करने योग्य है।
*[५]* वह सर्वाधार है।
*[६]* वह प्रकाश स्वरुप है।
*🪔गायत्री मूर्ति नहीं मंत्र है*🪔
आर्यावर्त्त साधना सदन पटेल नगर दशहरा बाग बाराबंकी में चल रही पावन गायत्री कथा के तत्वाधान चल रहे *गायत्री आध्यात्मि साधना शिविर* के तीसरे दिन का सत्र 🌼 गायत्री मूर्ति नहीं मंत्र है 🌼 इस विषय पर केंद्रित रहा!
सभी साधकों को बताया गया कि गायत्री मंत्र वेद का मंत्र। यह मंत्र *यजुर्वेद अध्याय ३६ का तीसरा मंत्र* है। वेद ईश्वर की कल्याणी वाणी है जो *मानव मात्र* के लिए है।वेद चार हैं ।(१) ऋग्वेद जिसमें १०५८९ मंत्र हैं।(२) यजुर्वेद जिसमें १९७५ मंत्र हैं।(३) सामवेद जिसमें १८७५ मंत्र हैं।(४) अथर्वेद जिसमें ५९७५ मंत्र हैं। इस प्रकार *चारों वेदों में कुल मिलाकर २०४१५ मंत्र* हैं।
🌻 *कृपया चिंतन करें ?*🌻
अब आप खुले दिमाग से विचार करें! अगर एक गायत्री मंत्र की मूर्ति होगी तो फिर शेष २०४१३ मंत्रों की भी मूर्ति होगी! सारा हिंदू समाज इतने मूर्तियों को कब!कहां!कैंसे ? पूजेगा।
तथाकथित धर्म प्रचारकों ने बिना सोचे समझें गायत्री मंत्र की मूर्ति बनाकर उसकी पूजा करके *गायत्री मंत्र के साथ वेद व सत्य सनातन वैदिक स़स्कृति* का भी उपहास मातृर किया गया है।
🪷 *आत्मा-परमात्मा अलिंग है*🪷
धर्म प्रेमी सज्जनों! जरा शास्त्र की भाषा को भी समझना जरूरी है। *सनातन शास्त्र वेद के अनुसार आत्मा व परमात्मा अलिंग* हैं। अर्थात आत्मा व परमात्मा दोनों का कोई लिंग नहीं होता। दोनों निराकार हैं।जबकि मूर्ति आकार की होती है।स्त्री व पुरुष शरीर का नाम है आत्मा का नहीं।जब परमात्मा न स्त्री है न ही पुरुष तो उसकी मूर्ति कैंसे बनाओगे?
वेद ज्ञान के अभाव में कतिपय धर्म प्रचारकों ने वेदमंत्र गायत्री की काल्पनिक मूर्ति बनाकर उसकी पूजा को ही सब कुछ मान लिया।परिणाम गायत्री के सही ज्ञान से लोगों को भटका दिया!
📚 *आओ सत्य को जानो और जनाओ*?📚
सत्य यही है कि गायत्री वेद का मंत्र है।मंत्र का अर्थ मूर्ति नहीं विचार है।गायत्री मंत्र में ईश्वर से प्रार्थना है कि *ब्रह्माण्ड में जितने भी स्त्री पुरुष हैं सबकी बुद्धि पवित्र हो और धर्म के पथ पर चले!*
🧘 *गायत्री ध्यान क्या है?*🧘
गायत्री मंत्र में ईश्वर के जिन गुणों का वर्णन किया गया हैं।ध्यान में बैठकर बुद्धिपूर्वक उन पर चिंतन करना फिर प्रमाणों से उसका परीक्षण करना फिर उस पर आचरण कर वैंसा ही व्यवहार करना ध्यान कहलाता है।
उदाहरण के लिए।गायत्री मंत्र में पहला *अक्षर ओ३म्* है। ओ३म् का अर्थ है सर्वरक्षक।अर्थात् परमात्मा सबकी रक्षा करता है।हम जीवात्माओं को भी चाहिए कि हमारा जितना सामर्थ्य है हम अपनी भी रक्षा करें ओरों की भी *अन्न,जल,वस्त्र,धन,बल,ज्ञान* से रक्षा करें।जब ऐसा करने में हम अभ्यस्त हो गये तो समझो हमारा ध्यान सफल है।इस प्रकार गायत्री *एक मंत्र है मूर्ति नहीं* गायत्री का ध्यान ही होगा।पूजा नहीं।गायत्री मंत्र में ईश्वर के गुणों का वर्णन है शरीर का नहीं।
🌹 *आज के भजन*🌹
*[१]* पुरोहित राम नारायण आर्य।
*[२]* बहन रंजना अवस्थी।
*[३]* पंडिता रुक्मिणी शास्त्री।
*आज का सत्संग*
ध्यान से पूर्व कैंसी तैयारी होनी चाहिए उस वैदिक चिंतन दिया गया!
*आचार्य सुरेश जोशी*
आर्यावर्त्त साधना सदन
पटेल नगर दशहराबाग बाराबंकी उत्तर प्रदेश!