ज़िंदगी के हसीं रिश्ते – मुकेश “कविवर केशव”

“ज़िंदगी के हसीं रिश्ते”

चार कंधे ले जाते जहां पे, वो धरती भी मुस्कुराती है।
देख घड़ियाली आंसू अपनो के, पते भी झड़ जाते है।
वहीं रिश्ते मस्ती के भाव में, मोक्ष धाम स्टेटस लगाते है।
चार दिनों की जिंदगी में आके, क्या तो कर लेता है।
अज्ञानी बनके आया था तू, ज्ञान जताने लग जाता है।
अच्छी पढ़ाई करके भी तू, संस्कार भूल जाता है।
काम न काज का, अढ़ाई मन अनाज तू बन जाता है।
काम करने की खातिर, रिश्वत भीख में मांग जाता है।
बेटे को पालकर भी तू, बेटे को दहेज में बेच खाता है।
देवी पूजा करके भी तू, बेटी ही जलाने लग जाता है।
नवरात्र जागरण करके भी तू, कन्या भ्रूण बहा जाता है।
गोद में पलकर के तू, मां बाप पे लांछन लगा जाता है।
मां की ममता को तू, शादी बाद भूल जाता है।
मजदूर भी परिवार खुश रखता है, गर्व से ज़िंदगी जीता है।
झूठी शान की खातिर तू, अपनो को ही भूल जाता है।
रिहायशी ज़िंदगी देके बच्चो को, वो ही वृद्धाश्रम छोड़ आते है।
नारी से बेटी जन्मे, जंवाई को दूर कर जाती है।
राखी हाथ में बंधवा के तू, बहनों का मान भूल जाता है।
रामायण घर में रखकर तू, महाभारत शुरू कर जाता है।
दोस्त बनकर तू हो तो, पीठ में छुरा घोंप जाता है।
अपनो की रक्षा करी नहीं तूने, धर्म बताने लग जाता है।
मंदिर कभी बचाया नहीं तूने, छवि चमकाने लग जाता है।
चार किताबें पढ़ कर तू, शास्त्र ही भूल तू जाता है।
ढोंगी बाते करके तू, पाखंडी बनकर तू रहता है।
शास्त्र के साथ तू तो, शस्त्र ज्ञान भूल जाता है।
दूध का कर्ज भूल के तू, रक्त का मोल भूल जाता है।
हमसे ही बना है तू, सिंदूर का मोल भूल जाता है।
कथनी करनी का मर्म भूल तू, स्वार्थ में ही जल जाता है।
मंदिर में नजरे झुका के तू, आंखों में दरिंदगी रखता है।
खुली आंखों से ही तू, व्यभिचार करता रहता है।
मुँह पे शहद लगाकर तू, मन में हवस पालता रहता है।
सद्कर्मों को त्याग कर तू, दिखावा हमेशा करता है।
स्वयं को ही भूलकर तू, पहचान खोजता रहता है।
यही तो जीवन चक्र है प्यारे, फिर भी भूलता रहता है।
सिकंदर भी तो यहां पे आके, मिट्टी में मिल जाता है।
हल्दीघाटी में भी तो, अकबर भी जमींदोज हो जाता है।
केसरिया बाना पहन कर, जौहर फिर से भड़क जाता है।
मां बाप के पुण्य को तू, गंगा में तू बहाता रहता है।
फिर भी तेरे जाने के बाद, दुनियाँ क्यों याद रखती है।
संभल जाओ मेरे यारों अब, अंत तेरा बहुत दर्दनाक होगा।
कुछ न जलेगा तेरे संग, वही मिट्टी में मिल जाएगा।
कविवर केशव कर रहा आगाह है,
कि वो चार कंधे भी मुस्कुराएंगे…!!!

स्वरचित एवं यथार्थपूर्ण (कॉपी राइट)
आपका अपना
मुकेश “कविवर केशव” सुरेश रूनवाल,
जोधपुर (राज.)