मशकूर हूँ ममनून हूँ या रब्ब ए कायनात, कतरे को आज तूने समन्दर बना दिया, सलीम बस्तवी अज़ीज़ी,,,,,


अनुराग लक्ष्य, 6 फरवरी
मुम्बई संवाददाता ।
उत्तर प्रदेश का सबसे साहित्यिक गतिविधियों वाला शहर बस्ती। नाम ज़बान पर आते ही कबीर, आचार्य शुक्ल, सर्वेश्वर दयाल सक्सेना, अख़्तर बस्तवी और जिगर बस्तवी का नाम ज़हन में गूंजने लगता है। यह मेरी खुशकिस्मती है कि मैने भी इसी माटी में जन्म लिया। जो मानिंद ए आफताब बना। बस्ती से 1656 किलो मीटर दूर मुंबई को अपनी कर्म स्थली बनाया, जिसमें मेरे शहर बस्ती साहित्य प्रेमियों और अदब नवाज़ों का बहुत प्यार और दुलार हमेशा मेरे हिस्से में आया। इस खुशी को आपसे बांटने के लिए आज कुछ खास कलाम के जरिए आपसे रूबरू होना चाह रहा हूँ। निम्न कलाम के ज़रिए,
कभी ज़माने में ऐसा भी कोई यार मिले,
वफ़ा के नाम पर हर रोज़ उससे प्यार मिले ।
ग़रीब मैं सही मेरा शहर न ग़रीब रहे,
हमारे हाथों को कोई ऐसा कारोबार मिले ।।
तालियों की गड़गड़ाहट से दबा जाता हूँ मैं,
शेर कहता हूँ तो ग़ज़लों में समा जाता हूँ मैं ।
हमने माना मीर ओ ग़ालिब का नहीं है दौर यह
फ़िर भी शौक़ ओ ज़ौक से अब भी सुना जाता हूँ मैं ।।
मशकूर हूँ ममनून हूँ या रब्ब ए कायनात,
कतरे को आज तूने समन्दर बना दिया।
आगाज़ और अंजाम भी उस शख़्स के ही नाम,
मालिक ने जिसे इल्म का गौहर बना दिया ।।
मैं इस दुनिया में क्या हूँ यह किसी से कह नहीं सकता,
मगर जो सच है उसको भी कहे बिन रह नहीं सकता ।
मैं वोह दरवेश हूँ इस दौर का तेरी हुकूमत में,
कि जैसे बह रहा है तू मैं हरगिज़ बह नहीं सकता ।।
आपकी मुहब्बतों और समा अतों के हवाले मैं सलीम बस्तवी अज़ीज़ी।