दशरथ महल में श्री राम कथा की सुधा वृष्टि

 

महेन्द्र कुमार उपाध्याय
अयोध्या। परमात्मा निर्गुण, निराकार और साकार भी है। जब द्रोपदी जी का चीर हरण हो रहा था तब द्रोपदी ने भगवान को पुकारा तो भगवान श्री कृष्ण को आना पड़ा। द्रोपदी ने कहा हे भगवान आप इतनी देर में क्यों आए ? भगवान श्री कृष्ण ने कहा आपने द्वारिका धीश श्री कृष्ण केके पुकारा तो क्या मैं यहां नहीं हु ? आप तो मेरी सखी हो। परमात्मा तो सर्वत्र है।गजराज को ग्राह पैर पकड़ कर खींचता रहा गजराज निर्गुण परमात्मा को पुकारता रहा कोई नहीं आया। भक्ति परमात्मा को नचा सकती है। कौशल्या जी जब राम जी को बुलाती है तब प्रभु नाचते हुए आते है। ये परमात्मा बिना पग के चलता है वह यहां अयोध्या में ठुमुक, ठुमुक कर चलता है। निर्गुण एवं सगुण में कोई अंतर नहीं है। वेद व्यास जी कहते है दुष्टों को मारना भगवान के अवतार का कारण नहीं है वो परमात्मा राक्षसों को मारने के लिए नहीं आ सकते। उनकी भृकुटी घूम जाय तो लंका स्वत जलकर नष्ट हो जाय। वेद व्यास जी कहते हैं केवल मानव शरीर ही प्राप्त कर लेना मानवता नहीं। इस लोक को अपने चरित्र की शिक्षा देने के लिए भगवान को आना पड़ा। परमात्मा के अवतार का कारण है मनुष्य को शिक्षा देना।उक्त उद्गार है यशस्वी कथा व्यास जगद गुरु रामानंदा चार्य स्वामी श्री राम दिनेशा चार्य जी महाराज के। दशरथ महल में श्री राम विवाह महोत्सव के पुनीत अवसर पर भक्तों को श्री राम कथा की अमृत मई कथा श्रवण करा कर कृतार्थ कर रहे है। दशरथ महल पीठाधीश्वर विंदु गद्याचार्य स्वामी श्री देवेन्द्र प्रसादाचार्य जी महाराज की अध्यक्षता एवं कृपालु श्री राम भूषण दास जी महाराज के व्यवस्थापकतव में संचालित श्री राम कथा में संत, महंतो, भक्तों की सहभागिता हो रही है। व्यास जी कहते हैं माता पार्वती जी भोले नाथ से कहती है मेरे गुरु श्री देवर्षि नारद जी भगवान को श्राप नहीं दे सकते, दोष भगवान का ही होगा। नारद जी की कथा साधकों के लिए महत्वपूर्ण है। भोले नाथ माता पार्वती को नारद जी की कथा श्रवण कराते हैं, नारद जी हिमालय की कंदराओं में जाकर तप करना प्रारंभ किया। इंद्रदेव ने नारद जी एवं अप्सराओं को तपस्या भंग करने हेतु भेजा। कामदेव विफल हो गया, नारद जी की तपस्या भंग नहीं हुई। नारद जी को अहंकार हो गया कि जिस कामदेव को भोले नाथ ने भस्म कर दिया था उसे हमने ससरीर जीत लिया। नारद जी भोले नाथ के पास पहुंचे समस्त वृतांत कह सुनाया, भोले नाथ ने कहा विष्णु भगवान से यह प्रसंग मत बताइएगा। व्यास जी कहते है नारद जी नहीं माने और भगवान के पास छीर सागर पहुंच गए। भगवान ने स्वागत किया, अपने निकट बैठाया, पूंछा बहुत दिनों बाद आना हुआ,, नारद जी ने कामदेव पर विजय प्राप्त करने का प्रसंग सुनाना प्रारंभ किया। भगवान की माया बड़ी प्रबल है, राम चरित्र कहने वाले ने काम चरित्र कहना प्रारंभ कर दिया। भगवान ने सोचा हमारे भक्त में अहंकार अंकुरित हो गया है, इसे जड़ से उखाड़ फेंकना आवश्यक है। नारद जी ने वहां से प्रस्थान किया, आगे जाने पर एक भव्य नगर देखा तो वहां पहुंच गए। वहां के राजा शील निधि की पुत्र विश्व मोहिनी का स्वयंवर उत्सव मनाया जा रहा था। राजा ने अपनी पुत्री की हस्त रेखा नारद जी को देखने की विनती की। हस्त रेखा देख नारद जी विस्मित हो उठे, कहा राजन आपकी पुत्री जिसे सुनेगी वह विश्व विजई एवं अमर होगा। नारद जी ने भगवान से उनकी सुंदरता मांगा, भगवान ने उन्हें बंदर का स्वरूप दे दिया। नारद जी की ओर विश्व मोहिनी ने देखा तक नहीं इसी मध्य भगवान वहां पहुंच गए राज कुमारी ने भगवान के गले में जय माल डाल दिया। नारद जी क्रोध से पागल हो गए। वैकुंठ की ओर दौड़ पड़े, मार्ग में भगवान विष्णु, माता लक्ष्मी एवं विष मोहिनी के साथ मिल गए। नारद ने भगवान को श्राप दिया। जो रूप आपने मुझे दिया वही रूप आपकी सहायता करेंगे। जिस प्रकार मैं नारी विरह में बेचैन हूं उसी प्रकार तुम भी पत्नी वियोग में तड़फोगे। भगवान ने श्राप को अंगीकार किया। तब नारद जी को अपनी भूल, गलती का अहसास हुआ, भगवान से छमा मांगने लगे। भगवान ने कहा नारद जी यह मेरी ही माया थी। अब आप भगवान शंकर जी के शत नाम का जाप कीजिए, शांति मिलेगी। भोले नाथ ने कहा देवी भगवान के अवतार का एक कारण यह भी था। व्यास जी भक्तों को श्री राम कथा रस का पान कराते हुए कहा कि सभी देवताओं ने एकत्र होकर भगवान को स्तुति की, भगवान ने आशीर्वाद दिया मै अयोध्या में महाराज दशरथ जी के यहां अवतार लूंगा। सभी देवताओं से भगवान ने कहा आप लोग अपने, अपने अंशों सहित अयोध्या पधारिए। एक बार महाराज दशरथ जी के मन में पुत्र ना होने की ग्लानि हुई। गुरु देव के चरणों में जाकर निवेदन किया, गुरु वशिष्ठ जी ने कहा राजन धैर्य धारण कीजिए, चार पुत्र होंगे। शृंगी ऋषि जी को बुलाकर यज्ञ कराया गया। अग्नि देव प्रकट हुए, खीर प्रसाद प्रदान किया जो चारों रानियों को दिया गया। नवमी तिथि को अपराह्न भगवान का प्राकट्य हुआ,, भए प्रकट कृपाला, दीन दयाला, जय, जय जय शुरभूपा,,। अयोध्या में राम, लक्ष्मण, भरत, शत्रुघ्न का जन्म हुआ, अयोध्या वासी हर्षित हुए। कथा पांडाल में कथश्रोता भक्त बधाई गान पर झूमने, नाचने लगे। इस पुनीत अवसर पर तन तुलसी द्वाराचार्य, मिथिला पीठाधीश्वर जगद गुरु स्वामी श्री विष्णु देवा चार्य जी महाराज, सिद्ध पीठ नाका हनुमान गढ़ी के यशस्वी पीठाधीश्वर श्री राम दास जी महाराज, हनुमान गढ़ी के श्री महंत माधव दास जी महाराज, बुंदेलखंड से पधारे श्री महंत अर्पित दास जी महाराज, साकेत भवन के श्री महंत प्रिया प्रीतम शरण जी महाराज, रामायणि श्री राम कृष्ण दास जी महाराज, महंत श्री विवेक आचारी जी, दंतधावन कुंड, श्री महंत सिया राम शरण जी श्री हनुमत धाम अयोध्या, संत श्री रमेश दास जी सहित बड़ी संख्या में भक्त श्री राम कथा का रसपान कर कृतकृत्य होते रहे।