
अनुराग लक्ष्य, 28 नवंबर
मुम्बई संवाददाता।
सलीम बस्तवी अज़ीज़ी।
ज़िंदगी जब दौड़ती है तो रगों में बहने वाला खून भी दौड़ता है, और इस दौड़ में कभी कभी ऐसा होता है, कि इंसान अपनी मंज़िल पा लेता है, लेकिन कभी कभी ऐसा भी हो जाता है कि इंसान अधूरे रह का मुसाफिर बनकर रह जाता है। लेकिन शुक्र है मेरे रब का और मेरे चाहने वालों का, जिनकी बेपनाह मुहब्बतें मेरे हिस्से में आईं। और मुंबई जैसी आर्थिक नगरी में आपका महबूब शायर सलीम बस्तवी अज़ीज़ी अपनी तमाम तर खूबियों के साथ आपसे हमेशा रूबरू होता रहा है। साथ ही अपनी साहित्यिक और अदबी सफर को आपके समक्ष रखकर सामाजिक सांस्कृतिक और देश की आवाम के नज़रियात को भी अपनी शायरी के ज़रिए हमेशा पेश किया है, अवगत कराया है। आज इन्हीं कुछ तानों बानो से बुनी कुछ शायरी और जज़्बाती कलाम से आपके रूबरू हो रहा हूं,
1/ कैसी खुशी, कैसा है गम दिल ने कहां यह जाना
चलने को मैं चलता रहा, मेरा सफर अनजाना ।
2/ मेरा मुकद्दर मेरा है लोगों, उस पर किसी का ज़ोर नहीं
मैं टूट जाऊं, मैं झुक जाऊं इतना तो मैं कमज़ोर नहीं ।
3/ तू मेरे ख्वाबों में चला आता है अब भी
और मैं तेरी राहों से गुज़र भी नहीं पाता ।
4/ ऐ ज़िंदगी यह कैसा सुखनवर बना दिया
तन्हाइयों को मेरा मुकद्दर बना दिया ।
5 / मुद्दत हुई किसी ने मेरा हाल न पूछा,
गुज़रा है किस तरह यह मेरा साल न पूछा ।
इस दौर ए परेशाँ में भी जो हैं मेरे अपने,
चलती है कैसे तेरी रोटी दाल न पूछा ।।
6 / सलीम बनकर ज़ेया फैले ज़मीन ओ आसमानों में
मेरी इस नात ए गोई को एक ऐसा मशगला दे दो
हबीबी या रसूलल्लाह मुझे इक सिलसिला दे दो
पहुंच जाएं तुम्हारे उम्मती सब खुल्द में एक दिन
हमारे हक में आका ऐसा कोई फैसला दे दो ।