
अनुराग लक्ष्य, 9 नवंबर
सलीम बस्तवी अज़ीज़ी
मुम्बई संवाददाता ।
कहते हैं कि जो इंसान अपने आंगन और अपनी घर की दहलीज़ को साफ रखने का हुनर जानता है। वहीं सफाई की महत्ता को समझने की भी सलाहियत रखता है। और वैसे भी कोई भी धर्म ऐसा नहीं है जिसमें सफाई की जरूरत को महसूस न कराया गया हो। मगर अफसोस कहने को तो हम अब 5 जी का भी इस्तेमाल कर रहे हैं लेकिन कभी कभी इंसान अपनी सोच और किरदार से इतना नीचे गिरा हुआ दिखाई देता है जिसकी वजह से पूरे समाज के सामने प्रश्न खड़ा हो जाता है जिसकी जवाबदेही तब वहां के रहने वालों के ऊपर आ जाती है।
कुछ ऐसा ही मंज़र चीता कैंप सेक्टर 2 में दिखाई दे गया जिसे देखकर पहले तो आंखों को विश्वास नहीं हुआ, लेकिन जब उस पार्क का गेट खोलकर मैं अंदर दाखिल हुआ तो मेरे होश उड़ गए।
मेरी इन्हीं आंखों ने उस पार्क की बदहाली को जब देखा तो आँखें शर्म से झुक गईं, कि अफसोस सद अफसोस। जहां बच्चों की किलकारियां और ठहाकों की गूंज गूंजनी चाहिए थी। वहां तो कूड़े और करकट का गुलदस्ता बना दिया गया है।
अब सवाल यह उठता है कि मुहल्ले वाले अगर इतने नासमझ और गंवार है तो बीएमसी क्या कर रही है। अभी तक इस गंदे और जंगलीपन को क्यों नहीं रोका जा रहा है। या विभाग द्वारा चीता कैंप सेक्टर 2 के रहवासियों के ऊपर कोई एक्शन क्यों नहीं लिया जा रहा है। अगर हम सच में इंसान हैं तो हमें कचरे और बच्चों की खिलखिलाहट के फर्क को ज़रूर समझना होगा। नहीं यह मासूम बचपन इसी कचरे के ढेर में एक दिन दब कर रह जाएगा ।