इश्क़ ए अहमद में दिल जो जालोगे तुम, मोमिनों खुल्द में घर बनाओगे तुम, सलीम बस्तवी अज़ीज़ी,,,


अनुराग लक्ष्य, 23 अक्तूबर
मुम्बई संवाददाता ।
इसमें कोई शक नहीं कि शायरी ने हमेशा इंसानियत भाईचारगी अमन और मुहब्बत का पैगाम दिया है। इसी लिए साहित्य और अदब को हमेशा अवाम ने अपनी ज़िंदगी का हिस्सा बनाया है। लेकिन नातिया मुशायरों में जो नातिया कलाम शोअरा हज़रात सुनते हैं, वोह सिर्फ अल्लाह और उसके महबूब की शान में ही होते हैं। इसी लिए आज कुछ नातिया कलाम आपके सामने लेकर हाज़िर हो रहा हूं, इस उम्मीद के साथ कि जिस तरह आप मेरी ग़ज़लों और गीतों को सुनते और पढ़ते आए हैं। इंशाल्लाह आपको मेरे नातिया कलाम भी उतने ही अच्छे लगेंगे।
1/ इश्क़ ए अहमद में दिल जो जालोगे तुम,
मोमिनों खुल्द में घर बनाओगे तुम ।
नात कहने का फन जो तुम्हें आ गया,
मिस्ल ए सूरज यहां जगमगाओगे तुम।।
2/ न दौलत न शोहरत न ज़र चाहिए,
मुझे अपने आका का दर चाहिए ।
इक हलचल मची है क्यों दिल में मिरे,
मेरे दिल को तैबा नगर चाहिए ।।
या खुदा एक छोटी सी है आरज़ू,
आल हजरत की मुझको डगर चाहिए।।
3/ या रब दर ए हबीब का सदका मुझे भी दे,
खुल्द ए बरीं को जाए जो रस्ता मुझे भी दे।
माना कि गुनहगार हूं बदकार हूं बहुत,
गर हो सके ज्यारत ए काबा मुझे भी दे।।